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________________ समाचार जैनों के ही नहीं, जन-जन के थे भगवान महावीर | लिये गौशाला समिति के समस्त पदाधिकारी, ट्रस्टियों को त्रिदिवसीय कार्यक्रम सम्पन्न उनके कुण्डलपुर प्रवास के दौरान गुरुवर आचार्यश्री ने मण्डला (म.प्र.), २२.०४.२००५ । भगवान महावीर मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद प्रदान किया। केवल जैनों के ही नहीं, बल्कि जन-जन के हैं। उनके संदेश इसके पूर्व क्षुल्लक श्री पूर्णसागर जी एवं ऐलक श्री सम्पूर्ण मानवता के कल्याण के लिए हैं। भगवान महावीर | 1 निश्चयसागर जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि को पाकर मानवता गौरवान्वित हुई है। भारतवर्ष को इस बात आज से २६०५ वर्ष पूर्व ५९९ ई. पूर्व भारतवर्ष के बिहार राज्य स्थित वैशाली गणतंत्र के कुण्डलपुर ग्राम में पिता का गर्व होना चाहिए कि उसने तीर्थंकर भगवान महावीर सिद्धार्थ एवं माता त्रिशला के यहाँ चैत्र शुक्ल त्रयोदशी (तेरस) जैसा प्रज्ञा-पुरुष इस विश्व को प्रदान किया है। भगवान | | के दिन भगवान् महावीर ने जन्म लेकर आर्यावर्त भारतदेश महावीर ने इस धरती के लोगों को ऐसा दर्शन दिया, जिससे | को धन्य किया था। अहिंसा के अग्रदूत आदिब्रह्मा तीर्थंकर प्रत्येक प्राणी को परमात्मा बनने का मौलिक अधिकार प्राप्त ऋषभदेव की परम्परा के अंतिम शासननायक के रूप में हुआ है। सच्चे अर्थों में वे ऐसे क्रांतिदूत थे, जिन्होंने जीवन के | भगवान महावीर आये। तीर्थंकर महावीर के अवतरित होते प्रत्येक क्षेत्र में क्रांति का संदेश देकर जनजागरण का ऐसा | ही वसुन्धरा पर सुख-शांति/अमन-चैन की स्थिति निर्मित शंखनाद किया था कि सारी सृष्टि ने एक असाधारणप परिवर्तन | हुई। आज राष्ट्र में बढ़ती हुई हिंसा, आतंक, युद्ध की विभीषिका की अनुभूति की थी। उक्ताशय के विचार आचार्य श्री अकाल, महामारी, भूकम्प, अतिवृष्टि, अनावृष्टि के वातावरण विद्यासागर जी महाराज के प्रभावक शिष्य पूज्य मुनि श्री में अणुबम नहीं, बल्कि भगवान महावीर के अणुव्रत ही " सुख-शांति प्रदान कर सकेंगे। वर्तमान को वर्धमान की समतासागर जी महाराज ने महावीर जयंती के पावन संदर्भ पर व्यक्त किये। मनिश्री ने कहा कि भगवान महावीर का | आवश्यकता है। कार्यक्रम-स्थल पर जैन-जैनेत्तर समुदाय के हजारों लोग उपस्थित थे, जो मुनिसंघ की वाणी का लाभ मानना था कि मानव क्रोध को शांति से, अभिमान को नम्रता | ले आनंदित हो रहे थे। से, माया को सरलता से तथा लोभ को संतोष से जीत सकता मुनिश्री १०८ समतासागर जी, ऐलक श्री १०५ है। मानव अपने मन को सदैव वासनाओं से मुक्त रखे, वह | निश्चयसागर जी, क्षल्लक श्री १०५ पूर्णसागर जी महाराज अपने जीवन का एक लक्ष्य, एकविचार सुनिश्चित करे।। के सान्निध्य में मण्डला के इतिहास में पहली बार सर्वोदयी हमारी भारतीय-संस्कृति का इतिहास अत्यंत समृद्ध और | जिनशासननायक भगवान महावीर की जन्मजयन्ती जयसम्पन्न है। भगवान महावीर ने कहा कि प्रेम और करुणा से | जयकारों के उद्घोष के साथ प्रातः ७.३० बजे श्री १००८ रहित जीवन श्मशान के समान है। मुनिश्री ने अंत में सम्यक् | शंतिसागर दिगम्बर जैन पंचायती मंदिर, महावीर स्वामी मार्ग, आहार, विचार, व्यवहार और व्यापार शद्धि पर जोर देते हये | पड़ाव से भव्य शोभायात्रा प्रारंभ हुई, जिसमें आचार्य श्री गांधी जी के तीन बंदरों की व्याख्या की तथा कहा कि - | विद्यासागर दिगम्बर जैन पाठशाला के नन्हें-मुन्ने बालक बालिकाओं द्वारा मनोज्ञ झांकी, टीलेवाले बाबा एवं जीवन के भगवान महावीर द्वारा निरूपित यदि 'बुरा मत सोचो' का यथार्थ अंतिम सत्य मृत्यु की वैराग्यताप्रद प्रस्तुति की गई। चौथा बंदर अपने पास होता, तो फिर इन तीन बन्दरों की ___ महावीरजयंती के त्रिदिवसीय कार्यक्रम में पहले आवश्यकता ही न पड़ती। शुद्धता के इन सिद्धांतों में चलकर चलकर | दिन जैनसमाज के युवाओं द्वारा प्रभातफेरी एवं अहिंसाआज भी आदिनाथ, श्रीराम और महावीर जैसा बना जा | वाहनरैली निकाली गई। जो दयोदय पश सेवा केन्द्र गौशाला सकता है। आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज की प्रेरणा व | होते हुए शहर के चारों जिनालयों की वंदना करते हुये ध्वजारोहण उनके आशीर्वाद से निकटवर्ती ग्राम आमानाला में सकल | के साथ सम्पन्न हुई। अगले दिन जैनसमाज द्वारा दयोदय दिगम्बर जैनसमाज मण्डला द्वारा संचालित दयोदय पशुसेवा | स्थिति पशुओं के लिए चारा-पानी एवं समुचित आहारदान सदन दयाधर्म की मिसाल है। इस अवसर पर मनिश्री करते हुए शहर में ठीक ३ बजे भण्डारा कार्यक्रम रखा गया। समतासागर जी ने लोगों से अपने निरीह अशक्त मक पशओं | सांयकालीन आरती, भक्ति एवं स्वाध्याय-सभा सम्पन्न हई। खासकर गायों को, गौशाला में पहुँचाने का आह्वान किया। अंतिम दिन अखिलभारतीय विशाल कविसम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें देश के जानेमाने कवि सम्मिलित पशु-वध रोकने की दिशा में उठाये गये सराहनीय कदम के | 26 जुलाई 2005 जिनभाषित Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524298
Book TitleJinabhashita 2005 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2005
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size5 MB
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