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________________ बाधक नहीं है। आयु कर्म है। इसका पूर्ण होने से पूर्व ही उदय में | पूर्व ही पका दिए जाते हैं या परिपक्व हो जाते हैं, ऐसा देखा जाता आना उदीरणा है। किसी भी कर्म की उदीरणा उसके उदयकाल में | है-उसी प्रकार परिच्छिन्न (अवधारित) मरणकाल के पूर्व ही ही होती है। यह उदीरणा भुज्यमान तिर्यञ्चायु और मनुष्यायु की | उदीरणा के कारण से आयु की उदीरणा होकर अकाल मरण हो सर्व सम्मत है किन्तु भुज्यमान देवायु और नरकायु की भी उदीरणा | जाता है। (तत्त्वार्थवार्तिक 2/52 की टीका) आचार्यवर्य आगे इसी सिद्धान्त में मिलती है जैसाकि लिखा भी है "संकमणाकरणू- को सिद्ध करने के लिए और प्रमाण देते हैं। वे कहते हैं कि णाणवकरणा होंति सव्व आऊणं" (गोम्मट कर्म गा. 441) एक | आयुर्वेद के सामर्थ्य से अकालमरण सिद्ध होता है, जैसे अष्टांग संक्रमण को छोड़कर बाकी के बन्ध, उत्कर्षण, उपकर्षण, उदीरणा, | आयुर्वेद को जानने वाला अति निपुण वैद्य यथाकाल वातादि के सत्त्व, उदय, उपशान्त, निधत्ति और निकाचना ये नवकरण सम्पूर्ण | उदयपूर्व ही वमन, विरेचन आदि के द्वारा अनुदीर्ण ही कफ आदि आयुओं में होते हैं। दोषों को बलात् निकाल देता है, दूर कर देता है तथा अकाल मृत्यु किसी भी कर्म की उदीरणा उसके उदयकाल में ही होती | को दूर करने के लिए रसायन आदि का उपदेश देता है। यदि है। उदीरणा को परिभाषित करते हुए नेमिचन्द्राचार्य ने कहा है अकालमरण न होता तो रसायन आदि का उपदेश व्यर्थ है। रसायन "उदयावली के द्रव्य से अधिक स्थिति वाले द्रव्य को अपकर्षकरण का उपदेश है, अत: आयुर्वेद के सामर्थ्य से भी अकाल मरण सिद्ध के द्वारा उदयावली में डाल देना उदीरणा है।" इससे निष्कर्ष होता है। दुख का प्रतीकार करने के लिए आयुर्वेदिक प्रयोग है, निकला कि कर्म की उदीरणा उसके उदय की हालत में ही हो ऐसा नहीं है उभयत: औषधि का प्रयोग देखा जाता है। केवल सकती है अथवा अनुदय प्राप्त कर्म को उदय में लाने को उदीरणा दु:ख के प्रतीकार के लिए ही औषध दी जाती है, यह बात नहीं है, कहते हैं।" अपितु उत्पन्न रोग को दूर करने के लिए और अनुत्पन्न को हटाने उदीरणा भुज्यमान आयु की ही हो सकती है क्योंकि के लिए भी दी जाती है। जैसे औषधि से असाता कर्म दूर किया गोम्मटसार कर्मकाण्ड में बध्यमान आयु की उदीरणा का "परभव जाता है, उसी प्रकार विष आदि के द्वारा आयु ह्रास और उसके आउगस्स च उदीरणा णत्थि णियमेण" इस नियम के आधार से | अनुकूल औषधि से आयु का अनपवर्त देखा जाता है। स्पष्ट निषेध किया गया है। यह भी कहा है कि देव नारकी,चरमोत्तम | महान् तार्किक विद्यानंदस्वामी भी उक्त कथन का काल देह के धारक तथा असंख्यात वर्ष की आयु वाले मनुष्य तिर्यञ्च और अकालनयों की दृष्टि से समर्थन करते हुए लिखते हैं कि को छोड़कर बाकी के उदयगत आयु की उदीरणा संभव नहीं है।। जिनका मरण काल प्राप्त नहीं हुआ उनके भी मरण का अभाव नहीं सभी कर्मों की उदीरणा अपकर्षकरण होने पर ही होती है अर्थात् उनका भी मरण हो जाता है क्योंकि खड्ग प्रहार आदि के है। जब तक कर्म के द्रव्य की स्थिति का अपकर्षण नहीं होगा, द्वारा मरण काल प्राप्त न होने पर भी मरण देखा जाता है। यदि यह तब तक उस द्रव्य का उदयावली में क्षेपण नहीं हो सकता। जो कहा जाये कि जिनका मृत्युकाल आ गया उन ही का खड्ग प्रहार कर्म अधिक समय तक उदय में आता रहेगा, वह उदयावली में आदि द्वारा मरण देखा जाता है, जिनका मरण काल आ गया उनका प्रक्षिप्त होने पर उदय में आकर नष्ट हो जायेगा। यह अपकर्षण के तो उस समय मरण होगा ही अत: खड्ग प्रहार आदि की अपेक्षा बिना नहीं हो सकता। नहीं रखता अर्थात् खड्ग प्रहार आदि होगा तब भी मरण होगा और खड्ग प्रहार आदि नहीं तब भी मरण होगा क्योंकि उसका मरणकाल भट्टाकलंक देव ने औपपादिक जन्मवाले देव-नारकी, व्यवस्थित (नियत) है। जिनके मरणकाल का खड्ग प्रहार आदि चरमोत्तम देहधारी और असंख्यात वर्षायुष्क को अनपवर्त्य आयु अन्वयु व्यतिरेक है अर्थात् खङ्ग प्रहार आदि होगा तो मृत्युकाल वाले अर्थात् कालमरण को प्राप्त होने वाले बताकर स्पष्ट कर दिया उत्पन्न हो जायगा, यदि खड्ग प्रहार आदि नहीं होगा तो मरण काल है कि जिनकी आयु संख्यात वर्ष की होती है, ऐसे कर्मभूमिया उत्पन्न नहीं होगा, उनका मृत्युकाल अव्यवस्थित (अनियत) है मनुष्य और तिर्यञ्च अपवर्त्य अर्थात् अकालमरण को प्राप्त हो अन्यथा खड्ग प्रहार आदि की निरपेक्षता का प्रसंग आ जायगा सकते हैं, उन्होंने लिखा है "अप्राप्तकालस्य मरणानुपलब्धेरपवर्ताभाव किन्तु अकाल मृत्यु के अभाव में आयुर्वेद की प्रमाणभूत चिकित्सा इतिचेत् नः दृष्टत्वादाम्रफलादिवत् । यथा अवधीरितपाकालात्-प्राक् तथा शल्य चिकित्सा (ऑपरेशन) की सामर्थ्य का प्रयोग किस पर सोपायोप सत्याग्रफलादीनां दृष्टपाकस्तथा परिच्छिन्नमरणकालात किया जायगा? क्योंकि चिकित्सा आदि का प्रयोग अकालमृत्यु के प्रागुदीरणा प्रत्यय आयुषो भवत्यपवर्तः।" अर्थात्-अप्राप्तकाल में | प्रतीकार के लिए किया जाता है। आगे और भी कहते हैंमरण की अनुपलब्धि होने से अकालमरण नहीं है, ऐसा नहीं "कस्यचिदायुरुदयान्तरङ्गे हेतौ बहिरङ्गे पथ्याहारादौ विच्छिन्ने कहना क्योंकि फलादि के समान जैसे कागज पयाल आदि उपायों जीवनस्याभावे प्रसक्ते तत्सम्पादनाय जीवनाधानमेवापमृत्यो के द्वारा आम्र आदि फल अवधारित (निश्चित) परिपाककाल के | रस्तुप्रतिकारः" अर्थात् आयु का अन्तरङ्ग कारण होने पर भी किन्तु 14 जनवरी 2003 जिनभाषित - Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524269
Book TitleJinabhashita 2003 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2003
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size5 MB
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