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________________ जैन आचार में इन्द्रियदमन का मनोविज्ञान • प्रो. रतनचन्द्र जैन द्वारा सुझाई गई यह दवा रोग से भी भयंकर है। न सिद्धान्त में वीत जैन आचार शास्त्र में इच्छाओं से मुक्ति के दो उपाय बतलाये गये हैं: विषयों से वैराग्य और इंद्रियदमन । इन्द्रियदमन का अर्थ है इन्द्रियों को बलपूर्वक विषयभोग से दूर रखना। इसे इन्द्रियनिग्रह और इन्द्रियसंयम भी कहते हैं । किन्तु आधुनिक युग के प्रसिद्ध मनोविश्लेषक फ्रायड ने दमन की कटु आलोचना की है। उसने इसे समस्त मानसिक और शारीरिक विकृतियों का कारण बतलाया है और उन्मुक्त भोग की सलाह दी है। किन्तु उसकी दवा रोग से भी भयंकर है। इच्छानिवृत्ति में इन्द्रियदमन की भी मनोवैज्ञानिक भूमिका है। उसका उद्घाटन करता है यह आलेख | एकमात्र साधन माना गया है। वीतरागता का लक्षण है समस्त शुभाशुभ इच्छाओं की निवृत्ति । अतः मुक्ति की सारी साधना इच्छाओं के विसर्जन की साधना है। निराकुलतारूप सच्चे सुख की प्राप्ति भी इच्छाओं के अभाव से होती है । इच्छाएँ जितनी कम होंगी, निराकुलता का अनुभव उतना ही अधिक होगा। जब इच्छाएँ पूर्णतः समाप्त हो जाती हैं तब पूर्ण निराकुलता का आविर्भाव होता है। जैन आचार शास्त्र में इच्छाओं से मुक्ति के दो उपाय बतलाये गये हैं: विषयों से वैराग्य और इन्द्रियदमन । इन्द्रिय दमन का अर्थ है इन्द्रियों को बलपूर्वक विषयभोग से दूर रखना। इसे इन्द्रियनिग्रह और इन्द्रियसंयम भी कहते हैं। मनीषियों ने कहा है जो पुण विसयविरत्तो अप्पणां सव्वदो वि संवरइ । मणहरविसहितो तस्स फुडं संवरो होदि ॥ कार्तिकेयानुप्रेक्षा - 101 'शम दम तैं जो कर्म न आवैं सो संवर आदरिये।' छहढाला 3/9 (शम = राग का अभाव, दम = इन्द्रियदमन) दमन की आलोचना किन्तु आधुनिक युग के प्रसिद्ध मनोविश्लेषक फ्रायड ने दमन की कटु आलोचना की है। उसने इसे सभ्य समाज का सबसे बड़ा अभिशाप बतलाया है और कहा है कि सभ्य संसार की जितनी भी मानसिक और शारीरिक बीमारियाँ है, जितनी हत्याएँ और आत्महत्याएँ होती हैं, जितने लोग पागल होते हैं, जितने पाखण्डी बनते हैं उनमें अधिकांश का कारण इच्छाओं का दमन है। इच्छाओं के दमन से व्यक्तित्व अंतर्द्वन्द्व से ग्रस्त हो जाता है। प्राकृतिक मन और नैतिक मन में संघर्ष छिड़ जाता है। प्राकृतिक मन भोग की इच्छा उत्पन्न करता है, नैतिक मन उसे दबाने का प्रयत्न करता है। इस संघर्ष में इच्छाएँ दब जाती हैं, पर नष्ट नहीं होतीं। वे गूढ़ (अचेतन) मन की गहराइयों में चली जाती हैं और ग्रन्थि बनकर बैठ जाती हैं। ये ग्रन्थियाँ चरित्र में विकृति उत्पन्न करती हैं, मनुष्य को रुग्ण, विक्षिप्त, छद्मी या भ्रष्ट बना देती हैं। इच्छाओं के दमन का परिणाम हर हालत में विनाशकारी है। इसलिए फ्रायड ने दमन का पूरी तरह निषेध किया है और उन्मुक्त कामभोग की सलाह दी है। यद्यपि उसके 1 मई 2001 निभाषित 16 Jain Education International गीता में भी कहा गया है कि जो मूढात्मा इन्द्रियों को बलपूर्वक विषयभोग से वंचित रखता है वह मन ही मन विषयों का स्मरण करता रहता है। इस प्रकार वह मायाचारी बन जाता है कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥ गीता 3/6 जैनाचार्य वट्टकेर ने भी मूलाचार में बतलाया है कि जिसका विषयों से राग समाप्त हो गया है वही वास्तव में संयमी है। जो बलपूर्वक इंद्रियों को विषयों से दूर रखता है वह संयमी नहीं है, क्योंकि उसका मनरूपी हाथी विषयों में रमण करता रहता है। इसलिए उसे सुगति प्राप्त नहीं होती भावविरदो दु विरदो ण दव्वविरदस्य सुगई हो । विसयवणरमणसीलो धरियव्वो तेण मणहत्थी ॥ मूलाचार, 995 पं. टोडरमल जी ने भी क्षमता के अभाव में जो बलपूर्वक उपवासादि किया जाता है उसके पाँच दुष्परिणाम बतलायें है- ( 1 ) क्षुधादि की पीड़ा असह्य होने पर आर्तध्यान उत्पन्न होता हैं, (2) मनुष्य प्रकारान्तर से इच्छा तृप्ति की चेष्टा करता है, जैसे प्यास लगने पर पानी तो न पिये किन्तु शरीर पर जल की बूँदे छिड़के, (3) पीड़ा को भुलाने के लिए जुआ आदि व्यसनों में चित्त लगाता है, (4) प्रतिज्ञा से च्युत हो जाता है, (5) उपवासादि की प्रतिज्ञा पूर्ण होने पर भोजनादि में अति आसक्ति पूर्वक प्रवृत्त होता है। (मोक्षमार्ग प्रकाशक 7/238240) यहाँ प्रश्न उठता है कि यदि इन्द्रियदमन इतना हानिकारक है तो जैन आचारसंहिता में उसे आवश्यक क्यों बतलाया गया है? और जब विषयों से वैराग्य होने पर इच्छाएँ समाप्त हो जाती हैं तब इन्द्रिय दमन का औचित्य क्या है? अथवा यदि इच्छाओं का विसर्जन केवल विषयविराग से संभव नहीं है, इसके लिए इन्द्रियदमन भी आवश्यक है तो इच्छाओं के विसर्जन में उसकी मनोवैज्ञानिक भूमिका क्या है? इसी की गवेषणा इस आलेख में की गयी है। इन्द्रियदमन की मनोवैज्ञानिकता For Private & Personal Use Only सामान्य धारणा यह है कि इन्द्रियों की विषयप्रवृत्ति सर्वथा मनोगत विषयवासना पर आश्रित है। मन की विषयासक्ति के कारण ही इच्छाएँ पैदा होती हैं और इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में प्रवृत्त www.jainelibrary.org
SR No.524252
Book TitleJinabhashita 2001 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2001
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size4 MB
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