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________________ होकर सदा गतिशील रहना चाहिये। यदि मत जाना, अन्यथा पेड़ की तरह दशा होगी।। चढ़ जाता है। आप भी चाहें तो संयमित होकर संयम की ओर गति होती रही तो हमारी प्रगति उन्नति हम चाहते हैं लेकिन उन्नति कैसे होगी एक-एक गुणस्थान ऊपर चढ़ सकते हैं। यही और उन्नति होने में देर नहीं है। हमारा यह जानना चाहिए। श्रुत को आधार बनाकर श्रुतज्ञानरूपी प्रवाह में संयम का बाँध बाँधकर अल्पज्ञान भी संयम के माध्यम से स्थिरता चलेंगे तभी श्रुत के द्वारा वहाँ पहुँच जायेंगे स्वयं को ऊँचा उठाने का उपाय है। संयम पाकर एक अंतर्मुहूर्त में अनंत ज्ञान में परिणत जहाँ तक महावीर भगवान पहुंचे हैं। कैवल्य रूपी बाँध में बँधे हुए श्रुत की यही महिमा हो सकता है। होने से पूर्व बारहवें गुणस्थान के अंतिम समय बंधुओ! आज यह पंचमकाल है इसमें तक श्रुत का आधार प्रत्येक साधक को लेना जैसे जल को तपाने पर वह वाष्प नियम से ज्ञान में, आयु में, शरीर और अन्य अनिवार्य है। थोड़ा सा श्रुत आने लगा तो बनकर ऊपर चला जाता है, उसे किसी मोक्षमार्ग में सहयोगी अच्छी सामग्री में ह्रास अहंकार मत करो। अहंकार करना नादानी है। आधार की आवश्यकता नहीं होती, इसी होता जायेगा, अतः अपने अल्प श्रुत श्रुत की विनय करना, आदर करना और जिस प्रकार जब कोई साधक, साधना करते-करते (क्षयोपशम) की ओर ध्यान न देकर ध्येय की रूप में बताया है उसी रूप में करना छद्मस्थ अवस्था की सीमा को पार कर जाताहै ओर बढ़ने का प्रयास करना चाहिये। जिस आवश्यक है। तब अंतरिक्ष में ऊपर उठ जाता है। केवलज्ञान प्रकार नदी छोटी होकर भी एक दिन समुद्र ज्ञान का प्रयोजन ध्यान है और ध्यान प्राप्त होते ही धरती से ऊपर उठ जाताहै और की दिशा में बढ़ने के कारण समुद्र में मिलकर का प्रयोजन केवलज्ञान है, अनंत सुख और आत्मा की अनंत ऊँचाइयाँ छू लेता है। प्रत्येक समुद्र का रूप धारण कर लेती है, उसी प्रकार शान्ति है। इसी को पाने का ध्येय बनाकर ज्ञान सम्यग्दृष्टि का यही एकमात्र लक्ष्य होना जिसकी दृष्टि मुक्ति की ओर हो गयी है उसका का आदर हमें करना चाहिये। हमारे ज्ञान में चाहिए कि मेरा जो श्रुतज्ञान उपलब्ध है, इसी भी एक दिन ऐसा आयेगा कि केवलज्ञान रूपी यदि अस्थिरता रहेगी तो हमारी यात्रा में मुझे संतुष्ट होकर नहीं बैठ जाना है, किन्तु महान सागर में समा जायेगा। यही एक मात्र उर्ध्वगामी नहीं होगी। जैसे-जैसे ऊपर जायेंगे इस ज्ञान के माध्यम से निरावरित केवलज्ञान उद्देश्य रहना चाहिये, सम्यक् श्रुतज्ञान से वैसे-वैसे देखने में आयेगा कि आसमान को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करना है। आपूरित हर आत्मा के इसी भाव को हमने | असीम है, ज्ञान का पार नहीं है। कैवल्यरूपी एक कविता में बांधा हैनिरावरण ज्ञान का आसमान असीम है। यही मात्र उपदेश देने या सुनने से ज्ञान नहीं धरा से फूट रहा है/नवजात है/और हमारा साध्य है। इसी को पाने के लिए गणधर बढ़ता। ज्ञान को उर्ध्वगमन संयम के द्वारा पौधा/धरती से पूछ रहा है/कि/यह आसमान स्वामी जैसे महान् आत्मा और कुन्दकुन्द जैसे मिलता है। हम श्रुतज्ञान को केवलज्ञान में ढाल को कब छूयेगा/ छू सकेगा क्या नहीं/तूने महान् आचार्य हमें निरन्तर ध्यान और सकते हैं। लेकिन आज तक कोई व्यक्ति ऐसा मकड़ा है/गोद में ले रखा है इसे/छोड़ दे/ आत्मलीनता की ओर प्रेरित करते हैं। नहीं हुआ जिसने संयम के बिना ही श्रुतज्ञान इसका विकास रुका है/ओ माँ/माँ की मुस्कान पानी को निम्नगा माना गया है। वह को केवलज्ञान का रूप दिया हो। श्रुत को बोलती है/भावना फलीभूत हो बेटा/आस नीचे की ओर बहता है। जल का यह स्वभाव केवल ज्ञान का साक्षात् कारण माना है। उसी पूरी हो/ किन्तु आसमान को छूना/आसान है। लेकिन जल का यदि कुछ उपयोग करना श्रुत की आराधना आप लोगों ने एक डेढ़ माह नहीं है/मेरे अन्दर उतर कर/तब छूयेगा/गहन है, बिजली बनाना है या सिंचन के लिए नहरें लगातार सिद्धांत ग्रंथों के माध्यम से की है। गहराइयाँ/तब कहीं संभव होगा/आसमान को बनाना हैं तो क्या करते हैं? बाँध बनाते हैं। जिस जिनवाणी को गुफाओं में बैठकर छूना/ जल की यात्रा तब भी नहीं रुकती । वह अब धरसेन, पुष्पदंत-भूतबली और वीरसेन आचार्य ऊँचाइयों की ओर यात्रा उस पौधे की | नीचे न जाकर ऊपर बढ़ने लगता है। जैसे महान् श्रुत सम्पन्न आचार्यों ने सम्पादित तभी संभव है जब वह पौधा धरती की गहन | ज्ञानोपयोग की धारा भी निरन्तर बहती रहती | किया है, उसे आज आप सभी सुख गहराइयों में उतरेगा। ध्यान रहे विकास दोनों | है। बहने वाले उपयोग का इतना महत्त्व नहीं सुविधाओं के बीच रहकर सुन रहे हैं, तो कोई ओर चलता रहता है। भले ही वह पौधा आधा | है जितना कि जब वह उर्ध्वगमन कर रहा है बात नहीं। इस प्रकार के ध्यान-अध्ययन की नीचे की ओर चला गया पर धरती माँ कहती तब महत्त्वपूर्ण होता है। श्रुतज्ञान होने पर ध्यान साधना करते करते एक दिन आपको वह है कि आसमान में ऊँचे जाना तभी संभव है | रूपी बाँध के द्वारा उस ज्ञान को ऊपर की ओर समय भी उपलब्ध हो सकता है जिस दिन जब धरती के भीतर जो कठोरता है उसको ले जाना ही उपलब्धि है। इसके लिये महान संयमपूर्वक ज्ञान की आराधना के माध्यम से भी भेदकर भीतर जाने का साहस करेगा। | संयम की आवश्यकता है। श्रुतज्ञान का कैवल्य की प्राप्ति होगी। पौधा जैसा आकाश में ऊपर हवा में हिलता सदुपयोग यही है कि उसको संयम का बाँध अंत में उन गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी रहता है, जड़ में भी ऐसा हिलने लग जाये | बाँधकर ऊपर उठा लेना। महाराज का स्मरण कर रहा हूँ. जिनके परोक्ष जो धराशायी हो जायेगा। पेड़ धरती से संबंध कैसे ऊपर उठाना? तो ऐसे जैसे पंडित | आशीर्वाद से ही ये सारे कार्य निर्विघ्न सम्पन्न छोड़ दे तो जीवन बर्बाद हो जाता है। जी वाचना के समय लब्धि स्थानों के बारे में | हो रहे हैं। उन्हीं की स्मृति में अपनी भावना इसी प्रकार जिन वाणी माँ से हमारा बता रहे थे कि श्रेणी कैसे चढ़ी जाती है। किसी | समर्पित करता हूँ। 'तरणि ज्ञानसागर गुरो, संबंध है। बंधुओ! जीवन जब तक रहे तब कर साधक अपनी साधना को ऊपर उठाता | तारो मुझे ऋषीश! करुणाकर करुणा करो, कर तक जिनवाणी माता को कभी मत भूलना | जात है। वह अल्प समय में ही भावों में | से दो आशीष।' और जिनवाणी माँ को भूलकर अन्यत्र कहीं विशुद्धता लाता है और देखते-देखते ऊपर मई 2001 जिनभाषित 11 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International
SR No.524252
Book TitleJinabhashita 2001 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2001
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size4 MB
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