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________________ भगवजिनसेनका विशेष परिचय । येऽभ्यस्यन्ति बहुश्रुताः मार्जन और क्रम-स्थापना आदिका जो ___ श्रुतगुरुं संपूज्य वीरं प्रभुं । कार्य करना होता है, यथासम्भव और ते नित्योज्वलपद्मसेनपरमाः (?) यथावश्यकता, वह सब कार्य इस टीकामें विद्वद्रत्न श्रीपाल द्वारा किया गया है। श्रीदेवसेनाचिताः । उनकी भी इस टीकामें कहीं कहीं पर, भासन्ते रविचंद्रभासि जरूर कलम लगी हुई है। यही वजह है सुतपाः श्रीपालसत्कीर्तयः ।। कि उनका नाम सम्पादकके रूप में खास आदि पुराणमें भी आपके निर्मल तौरसे उल्लेखित हुआ है । अन्यथा, गुणोंका कीर्तन किया गया है और आप. श्रीपाल आचार्यने पूर्वाचार्योकी सम्पूर्ण को भट्टाकलंक तथा पात्र केसरी (विधा- टीकाओका एकत्र संग्रह करके उस नन्द ) जैसे विद्वानोंकी कोटिमें रखकर संग्रहका नाम 'जयधवला' रक्खा, इस यह बतलाया गया है कि आपके निर्मल कथनकी कहींसे भी उपलब्धि और पुष्टि गुण हारकी तरहसे विद्वानोंके हृदयों में नहीं होती। प्रारूढ़ रहते हैं, यथा जिनसेनके समकालीन विद्वानों में भट्टाकलंक श्रीपाल-पात्रकेसरिणां गुणाः। पद्यसेन, देवसेन और रविचन्द्र नामके विदुषां हृदयारूढा हारायन्तेऽति निर्मलाः ॥ भी कोई विद्वान हो गये हैं । यह बात ऊपर इससे स्पष्ट है कि श्रीपाल एक ऐसे उद्धृत किये हुए प्रशस्तिके मन्तिम प्रभावशाली प्राचार्य थे जिनका सिक्का पयल पद्यसे ध्वनित होती है। अच्छे अच्छे विद्वान् लोग मानते थे। जिन गुर्जरनरेन्द्र . महाराज अमोघवर्ष सेनाचार्य भी आपके प्रभावसे प्रभावित (प्रथम) जिनसेन स्वामीके शिष्यों में थे। उन्होने अपनी इस टीकाको लिखकर थे. इस बातको स्वयं जिनसेनने अपने आप हीसे उसका सम्पादन (संशोध- पार्वाभ्युदयमें प्रकट किया है। और नादि कार्य) कराना उचित समझा है, गुणभद्राचार्यने एक पद्यमें यह सूचित और इस तरह पर एक गहन विषयके किया है कि महाराज अमोघवर्ष श्रीजिनसैद्धान्तिक ग्रन्थकी टीकापर एक प्रसिद्ध स्वामीके चरणकमलोंमें मस्तकको रखऔर बहुमाननीय विद्वानके नामकी कर अपनेको पवित्र मानते थे। इससे ( सम्पादनकी) मुहर प्राप्त करके उसे अमोघवर्ष जिनसेनके बड़े भक्त थे, यह विशेष गौरवशालिनी और तत्कालीन पाया जाता है। परन्तु जिनसेन स्वामी विद्वत्समाजके लिए और भी अधिक उप. महाराज अमोघवर्षको किस गौरव योगिनी तथा आदरणीया बनाया है। भरी दृष्टिसे देखते थे, उनपर कितना प्रेम यही, हमारी समझमें, श्रीपाल-संपादिता रखते थे, और उनके गुणोपर कितने विशेषणका रहस्य है। और इसलिये अधिक मोहित और मुग्ध थे, इस बातका इससे यह स्पष्ट है कि एक सम्पादकको पता अभी तक बहुत ही कम विद्वानों को किसी दूसरे विद्वान् लेखककी कृतिका मालूम होगा। और इसलिये हम इसका उसके इच्छानुसार सम्पादन करते समय, परिचय अपने पाठकोंको प्रशस्तिके जरूरत होनेपर, उसमें संशोधन, परि- निम्नलिखित पद्योंपरसे कराते हैं जिन:घर्तन, परिवर्धन, स्पष्टीकरण, भाषा-परि. में गुर्जरनरेन्द्र (महाराज अमोघवर्ष ) Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522890
Book TitleJain Hiteshi 1921 Ank 05 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1921
Total Pages72
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size10 MB
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