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________________ अङ्क १-२] उपासना-तत्त्व। प्रवृत्ति होती है* । इस प्रकार परमात्मा- कारको भुला देते हैं उन्हें असाधु तथा के द्वारा जगत्का निःसीम (बेहद ) उप- असजन समझना चाहिये। लोकमें भी कार होता है। इसी कारण परमात्माके उन्हें कृतघ्नी, अहसानफरामोश और गुणसार्व, परमहितोपदेशक, परमहितैषी भेट आदि बुरे नामोंसे पुकारा जाता है। और निर्निमित्तबन्धु इत्यादि भी नाम ऐसे लोग; जबतक उनकी यह दशा कायम कहे जाते हैं। इस महोपकारके बदलेमें रहती है, कभी उन्नति नहीं कर सकते हम (संसारी जीव) परमात्माके प्रति और न आत्मलाभके सन्मुख होसकते हैं। जितना आदर-सत्कार प्रदर्शित करें और इसलिये अपने महोपकारी परमात्माके जो कुछ भी कृतज्ञता जतलाएँ वह सब प्रति आदर-सत्कार रूपसे प्रवर्तित होना तुच्छ है। जो सज्जन अथवा साधजन हमारा खास कर्तव्य है। होते हैं वे अपने उपकारीके उपकारको दूसरे, जब श्रात्माकी परम स्वच्छ कभी नहीं भूलते, बराबर उसका स्मरण और निर्मल अवस्थाका नाम ही परमात्मा रखते हैं और इस उपकार-स्मृतिके चिह्न- है और उस अवस्थाको प्राप्त करनाखरूप अनेक प्रकारसे अपने उपकारीके अर्थात्, परमात्मा बनना सब आत्माओंप्रति अपना आदर सत्कार व्यक्त किया का अभीष्ट है, तब आत्मस्वरूपकी या करते हैं; जैसा कि, श्लोकवार्तिकमें, दूसरे शब्दोंमें परमात्मस्वरूपकी प्राप्तिके श्रीमद्विद्यानंदस्वामीद्वारा, परमात्माकी लिये परमात्माकी पूजा भक्ति और उपाउपासनाके समर्थनमें, उद्धृत किये हुए सना करना हमारा परम कर्तव्य है। निम्नलिखित एक प्राचीन पद्यसे प्रकट है:- परमात्माका ध्यान, परमात्माके अलौकिक चरित्रका विचार और परमात्माकी अभिमतफलसिद्धेरभ्युपायः सुबोधः । ध्यानावस्थाका चिन्तवन ही हमको अपनी प्रभवति स च शास्त्रात्तस्यचोत्पत्तिराप्तात् ॥ आत्माकी याद दिलाता है-अपनी भूली इति भवति स पूज्यस्तत्प्रसादात्प्रबुद्धे. हुई निधिकी स्मृति कराता है-उसीसे नहि कृतमुपकारं साधवो विस्मरन्ति ॥ आत्माको यह मालूम पड़ता है कि मैं . इस पद्यमें यह बतलाया गया है कि, कौन हूँ (कोवाऽहं) और मेरी आत्मशक्ति "मनोवांछित फलकी सिद्धिका उपाय क्या है (का च मे शक्तिः)। परमात्माका सम्यग्ज्ञान है ; सम्यग्ज्ञानकी उपलब्धि भजन और स्तवन ही हमारे लिये अपने शास्त्र के द्वारा होती है और शास्त्रकी प्रात्माका अनुभवन है । आत्मोन्नतिमें उत्पत्ति प्राप्त भगवानसे है, इसलिये वे अग्रसर होनेके लिये परमात्मा ही हमारा प्राप्तभगवान् (परमात्मा) जिनके प्रसादसे श्रादर्श है । आत्मीय गुणोंकी प्राप्तिके लिये प्रबुद्धताकी प्राप्ति होकर अभिमत फलकी हम उसी आदर्शको अपने सन्मुख रखकर सिद्धि होती है। संतजनोंके द्वारा पूज्य अपने चरित्रका गठन करते हैं। अपने ठहरते हैं। सच है साधजन किसीके किये श्रादर्श पुरुषके गुणोंमें भक्ति तथा अनहुए उपकारको कभी भूलते नहीं हैं।" रागका होना स्वाभाविक और ज़रूरी है। इससे जो लोग दूसरोंके किए हुए उप- बिना अनुरागके किसी भी गुणकी प्राप्ति नहीं हो सकती। उदाहरणके लिये, यहि • श्रेयो मार्गस्य संसिद्धिः प्रसादात्परभेष्ठिनः। कोई मनुष्य संस्कृत भाषाका हि -आप्तपरीक्षा। होना चाहे तो उसके लिये यह ज़र For Personal & Private Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.522885
Book TitleJain Hiteshi 1920 Ank 10 11
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1920
Total Pages68
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size9 MB
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