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________________ जैनसिद्धान्तभवन, पाराका निरीक्षण । मिल सकेगा। साथ ही यह भी मालूम कनड़ी लिपिके संग्रहमें, कनड़ी भाषाके हो सकेगा कि एक एक विषयके कितने ग्रन्थों अथवा कनडीटीकाओंको छोड़कर, कितने प्रन्थ हैं और किस किस विद्वान्ने ऐसे ग्रन्थोंकी अभी बहुत कमी है जिनकी कौन कौन ग्रन्थ बनाये हैं। भाषा संस्कृत तथा प्राकृत है और जो संपूर्ण ग्रन्थोकी जाँच हो जानेके बाद देवनागरी लिपिमें अन्यत्र उपलब्ध न भवनमें 'कार्ड सिस्टम' श्रादिके द्वारा इस होते हों । परन्तु ऐसे बहुतसे ग्रन्थ ढंगसे काम होना चाहिये जिससे इस दक्षिणके भंडारोंमें मौजूद हैं और इसलिये प्रकारकी सूची जल्द तैयार हो सके। उनकी प्राचीन अथवा नवीन प्रतियोंके __ सूचीके अतिरिक्त भवनमें नवीन नवीन भवनमें आनेकी बड़ी ज़रूरत है। इसके प्रन्थोंका संग्रह होनेकी भी बहुत बड़ी लिये, सूची तैयार हो जाने पर, पं. ज़रूरत है। संग्रहका यह कार्य बहुत शान्तिराजय्याजीको भी यदि कुछ समयके अर्सेसे बन्द है। शुरू शुरूमें जो कुछ संग्रह वास्ते कर्णाटक प्रान्तमें भेजा जाय तो हुआ था उसमें बादको बहुत कम वृद्धि बहुत कुछ काम हो सकेगा। आपकी हुई मालूम होती है । भवनमें हस्तलिखित रुचि अब ऐसे कामोंमें विशेष पाई जाती प्रन्थोंका, ख़ासकर कनड़ी लिपिके ग्रन्थों है और आपने पौने दो महीने तक हमारे का अधिकांश संग्रह ब्रह्मचारी नेमि- साथ रह कर बराबर भवनमें रात दिन सागरजीकी कृपाका फल है, जो कि प्रेमपूर्वक काम किया है । बाक़ी देवभवनके ट्रस्टी भी हैं। दक्षिण प्रान्तके नागरी लिपिमें जो ग्रन्थ जयपुरादिकके बहुतसे भंडारोंकी सूचियाँ उतरवाकर भंडारोंमें पाये जाते हैं और भवनमें मौजूद भिजवा देना भी उन्हींका काम था। नहीं हैं उनकी वहाँसे ही नकले कराकर उनसे यदि बराबर काम लिया जाता तो मँगानी चाहिये। जिनकी वहाँ नकलें न अबतक दक्षिणका बहुतसा ग्रन्थसमूह हो सके उनकी नकलोका भवनमें प्रबन्ध खिचकर भवन में आ जाता और एक किया जाय । भवनमें दो एक लेखकोंके अपर्व संग्रह हो जाता। संग्रह यद्यपि स्थायीरूपसे रहनेकी जरूरत हैजो भवनके अब भी अच्छा है परन्तु जैसा चाहिये संग्रह परसे दुष्प्राप्य तथा अलभ्य ग्रन्थोंवैसा नहीं है। हमारी रायमें ब्रह्मचारी- की और प्रतिके लिये बाहरसे आये हुए जीको फिरसे इस काममें नियोजित करना हुए ग्रन्थोकी नकलका काम किया करें चाहिये और संग्रहके लिये उन्हें सब और इस तरह भवनकी तथा बाहरवालोंप्रकारकी सुविधाएँ देनी चाहिये । उनके की जरूरतोंको कुछ अंशोंमें पूरा कर सकें। पास भवनको एक संशोधित सूची और परन्तु सूची श्रादि सम्बन्धी यह सब खासकर वह लिस्ट भेजनी चाहिये जो काम यथेष्ट रीतिसे, तभी हो सकता हमने उन ग्रन्थोंकी तैयार कराई है जो है जब कि अधिकारीवर्गकी ओरसे. कि भवनमें मौजूद नहीं हैं, जिससे वे इस तरह ख़ास लक्ष्य दिया जाय और वे उन्हीं ग्रन्थोंका संग्रह कर सके जिनकी इस कार्यको उपयोगिता तथा महत्ताको भवनको ज़रूरत है। एक ग्रन्थकी कई कई समझ कर हर तरहसे इसके पूरा करने में प्रतियोंके संग्रहकी विशेष जरूरत नहीं है, कटिबद्ध हो। साथ ही काम करनेवाले सिवाय उन प्रतियोंके जो कि प्राचीनता योग्य व्यक्तियों को, उनके काममें, यथाआदिकी दृष्टिसे कुछ महत्त्व रखती हो। शक्ति सब प्रकारकी सहायता और सहू Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522885
Book TitleJain Hiteshi 1920 Ank 10 11
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1920
Total Pages68
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size9 MB
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