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________________ ૨૭૦ जैनहितैषी [भाग १४ कराते । वेश्यानृत्य कराकर और उसके द्वारा वेश्यानृत्य दिखलाकर क्या आपने उन्हें नष्ट अपनी तथा दूसरोंकी संतानको व्यभिचार व करनेका प्रयत्न नहीं किया और उन्हें वेश्यापाप-प्रचारका उपदेश दिलाकर तथा अन्य व्यसनकी शिक्षा नहीं दी ? अपनी उस सुकुप्रकारसे भी उसके नष्ट भ्रष्ट हो जानेका बीज मार कन्याको, जिसके विवाहमें वेश्या नचाई बोकर, आपने अपनी घरू संस्थाओं आदिको गई है, आपने इसके द्वारा क्या सिखलाया जो कुछ दान दिया है उसका क्या अर्थ है, है ? यह जाननेकी हमारी बड़ी उत्कंठा है। यह कुछ समझमें नहीं आता । एक ओर तो इसके सिवाय हम इतना और पूछना चाहते पापप्रचारको खूब उत्तेजन देना और पापि- हैं कि क्या आप जातिके मुखिया नहीं हैं ? योंको सहायता देकर उन्हें गलेसे लगाना, यदि हैं तो जातिके मुखियोंको लक्ष्य करके दूसरी ओर दानके नामसे कुछ धार्मिक कामोंकी आपने जो कुछ अपने व्याख्यानमें कहा था भी पीठ ठोकना, यह किस नीति पर अवल- उसका पालन क्या इसी तरह किया जाता म्बित है ? क्या सेठजी इसके द्वारा अपने , है ? क्या इसे हम 'परोपदेशकुशलता' ही आचरण पर पर्दा डालना चाहते हैं या अथवा 'खुदरा फजीहत दीगरांरा नसीहत ; उसके विरुद्ध उठनेवाली आवाजको दबानेकी न समझें ? क्या यह समझें कि आपके विचार फिकरमें हैं; अथवा पबलिकको यह समझानेकी अब बदल गये हैं और आप इस समय रखते हैं कि इस तरह पर हमने अपने दुष्क- वेश्यानृत्यको ही जैनजातिके उत्थानका र्मका प्रायश्चित्त किया है। कुछ भी हो; हमें प्रधान साधन समझते हैं; इसीसे आप वेश्याइस विषयमें आपकी समझ ठीक मालूम नहीं नृत्यके प्रचारमें लगे हुए हैं और स्वयं अगुआ होती और न आपका वह दान धार्मिक- बनकर दूसरोंके सामने उसका उदाहरण रखते भावोंसे प्रेरित होकर दिया हुआ जान पड़ता हैं । आशा है सेठजी इन सब बातोंका उत्तर है। जो वेश्यायें स्वभावतः ही-अपनी वृत्तिके देकर हमें संतुष्ट करनेकी अवश्य कृपा करेंगे अनुसार-संसारमें अनेक प्रकारके अंमगलोंको और यदि उन्हें अब भी अपनी भूल मालूम मनानेवाली हैं उन्हें विवाह जैसे मांगलिक पड़े तो उसे प्रकाश्य रूपसे सर्व साधारण पर कार्यों में बुलाकर नचाना कभी भी आजकलके प्रकट करनेकी उदारता दिखलाएँगे । साथ ही सुदूरदर्शी विद्वानों तथा धार्मिक पुरुषोंकी दृष्टिमें आगेको वेश्यानत्य न करानेकी ही नहीं, बल्कि अच्छा नहीं समझा जा सकता । किसी कविने उसके प्रचारको रोकनेकी दृढ प्रतिज्ञा धारण ठीक कहा है: करेंगे। अन्यथा हमें इस बातका बड़ा भय है ब्याह समय सौभाग्यका, रांड नचावें भूर। कि सेठजीके इस वेश्यानृत्यप्रेमसे इन्दौरमें आपकी मंगलमें असगुन करें, पड़ी बुद्धिपै धूर ॥ कहीं स्थायी नृत्यशाला कायम न हो जाय । हम सेठजीसे, उन्हींके ( ऊपर उद्धृत किये हुए ) शब्दोंकी याद दिलाकर, पछते ४-विलायत न जाना अपराध । हैं कि आपने वेश्यानृत्यमें जो धन खर्च किया महात्मा गाँधीजी, नवजीवनमें, अपनी विलाहै वह क्या किसी सुकृतमें व्यय हुआ है ? यत यात्राके विचारका स्पष्टीकरण करते हुए, अथवा उसे वैसे ही व्यर्थ नष्ट हुआ समझना लिखते हैं कि, “ किसी भी प्रसंगसे. विलायत न चाहिये ? अपनी और दूसरोंकी संतानको जाना, ऐसी मेरी मान्यता कभी नहीं हुई । मैं Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522882
Book TitleJain Hiteshi 1920 Ank 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1920
Total Pages32
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size5 MB
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