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________________ ' २५० जैनहितैषी [भाग १४ हम अपने आपको उन्नत और उच्च समझते हैं। उनकी स्थितिको ग्रहण करो । केवल इसी प्रकार क्योंकि सहानुभूति और स्वार्थ एक स्थानपर तुम उनके साथी होकर उनके जीवन और अनुस्थिर नहीं रह सकते। परन्तु हम ऐसे मनु- भवको पूर्णतासे समझोगे और जब' किसीको व्योंके साथ सहानुभूति रख सकते हैं जो उन समझ लोगे तो फिर उसको निन्दित और दूषित पापों और क्लेशोंमें फंसे हुए हैं जिनसे हमने नहीं ठहराओगे। मनुष्य एक दूसरेको दूषित सफलताके साथ अपने आपको मुक्त कर लिया और अपराधी बताकर इसी वास्ते दूरसे टालते है। जिस पुरुषकी महत्ता हमसे बढ़कर है उसको हैं कि वे एक दूसरेको भलेप्रकार समझते नहीं। । हम अपनी सहानुभूतिकी छायासे ढंक नहीं और जब तक वे अपने आप पर विजय ने प्राप्त सकते हैं, परन्तु उसके साथ हम अपनेको इस कर लें और शुद्ध न बन लें तब तक समझ भी प्रकार रख सकते हैं कि उसकी महत्तरा सहा- कैसे सकते हैं ? नभतिका सहारा ले सकें और उन पापों और वृद्धि. परिपक्वता, और विस्तरताको जीवन । दुःखोंसे मुक्त हो सकें जिनमें हम अब भी फँसे कहते हैं और एक प्रकारसे देखा जाय तो पापी ___ और पुण्यात्मामें विशेष अन्तर नहीं है, केवल पक्षपात और दुष्कामनायें सहानुभूतिके श्रेणी और क्रमका अन्तर है। पुण्यात्मा किसी मार्गकी बड़ी भारी रुकावटें हैं और अहंकार समयमें पापी था और पापी भविष्यमें पुण्यात्मा सहानभति ग्रहण करनेमें बाधा डालता है। होगा। पापी बच्चा है और पुण्यात्मा वृद्ध है । तम उसके साथ सहानुभूति नहीं रख सकते जो पापियोंको दुष्ट समझकर उनसे अपने आपको जिसके लिये तुम्हारे मनमें पूर्वहीसे घृणा है पृथक रखता है वह उस परुष की नाई है जो और उस मनुष्यकी सहानुभूति तुम अपने छोटे बच्चोंको निर्बाध, अनाज्ञाकारी और खिलोंपर रखना नहीं चाहते जिसके लिये तुम्हारे नोंसे खेलनेवाले समझकर उनसे दूर हटता है। मनमें पूर्वहीसे द्वेष है । जिस मनुष्यसे तुम घिन करते हो उसके जीवनको तुम समझ . ____ जीवन समान है, परन्तु देखने में इसके कई नहीं सकते और जिनके प्रति तम अपनी पाश- भेद हैं । पुष्प वृक्षसे कोई पृथक् पदार्थ नहीं है। विक बुद्धिसे ईर्ष्या करते हो उसको भी नहीं यह उसी वृक्षका एक अंग है बल्कि पत्तीका एक समझ सकते, किन्तु जैसे तुमने उसके लिये दूसरा भेद है । भाप पानीसे कोई पृथक् वस्तु अपने हृदयमें अपूर्ण और कच्चे विचार बाँध नहीं है, वह पानीका रूपान्तर है । पुण्यात्मा स्वखे हैं उन्हींके अनुसार समझोगे । अपनी परिपक्व और परिणत पापी है। अशुद्ध और कारणशून्य सम्मातिके द्वारा तुम पापी वही है जिसकी बुद्धि अपरिपक्व केवल उसकी बुराईको देख सकोगे, भलाई नहीं। है और जो अज्ञानताके कारण अशुद्ध कार्य-प्रणा- यदि तुम्हें दूसरोंकी यथार्थता समझनी है लीमें रुचि रखता है । पुण्यात्मा वह है जिसकी तो उनके और अपने बीचमें रुचि या अरुचि, बुद्धि परिपक्व है और जिसकी कार्य-प्रणाली ३पक्षपात तथा स्वार्थिक वासनाओंको मत आने शुद्ध और सत्य है। एक पापी दूसरे पापीको "दो; उनके कार्योंका विरोध न करो और उनके दूषित बताता है, क्यों कि दूषित बताना कार्यकी मतों और विश्वासोंको दूषित न ठहराओ । थोड़े अशुद्ध प्रणाली है। पुण्यात्मा पापीको दूषित समयके लिये तुम अपने आपको पृथक् रखकर नहीं ठहराता, क्यों कि उसको स्मरण रहता है Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522882
Book TitleJain Hiteshi 1920 Ank 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1920
Total Pages32
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size5 MB
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