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________________ अङ्क ७ ८] धर्म और समाज। धर्म और समाज। युगमें पश्चिमनिवासियोंकी यदि धर्म पर वह श्रद्धा नहीं है जो उनके पूर्वजोंकी थी तो Ne: वह सकारण है । यद्यपि पूर्वापेक्षा अब उनके (प्रतिभासे उद्धृत।) धर्मका भी बहुत कुछ संस्कार हो गया है और शिक्षाकी उन्नतिके साथ साथ जिसमें समाजके लिए धर्मकी आवश्यकता है या यूरोप और अमेरिकाने सबसे अधिक भाम - नहीं ? इस प्रश्न पर कुछ अपने विचार प्रकट लिया है, उनके धर्ममें भी सहिष्णुता, स्वत• करना ही आज इस लेखका उद्देश है । प्राचीन न्त्रता और उदारताकी मात्रा बढ़ गई है, और नवीन अथवा पूर्व और पश्चिम इन दोनोंके तथापि धर्मवादके परिणामस्वरूप जो कड़वे फल संघर्षसे यह प्रश्न उत्पन्न हुआ है । पूर्वी सभ्यता उनको चखने पटे हैं उन्होंने उनको धर्मकी सदासे धर्मकी पक्षपातिनी रही है और उसने सीमा नियत कर देनेके लिए बाधित किया, धर्मको समाजमें सबसे ऊँचा स्थान दिया है। तदनुसार उन्होंने धर्मकी अबाध सत्तासे अपने पश्चिमी सभ्यता इस समय चाहे उसकी विरो समाजको मुक्त कर दिया । अब वहाँ यही नहीं धिनी न हो, पर उससे उदासीन अवश्य है । उसस उदासान अवश्य है कि समाजकी शासन-सत्तामें धर्म कुछ विक्षेप और कमसे कम समाजकी उन्नतिके लिए नहीं डाल सकता, किन्तु व्यक्तिस्वातन्त्र्य और वह उसे आवश्यक नहीं समझती । उसकी सामाजिक प्रबंधमें भी कुछ हस्तक्षेप नहीं कर सम्मतिमें बिना धर्मका आश्रय लिए भी नैतिक सकता और बहुतसी बातोंके समान धर्म भी बलके सहारे मनुष्य अपनी वैयक्तिक और सामा - एक व्यक्तिगत बात मानी जाती है, जिसका जी जिक उन्नति कर सकते हैं। चाहे. किसी धर्मको माने. न चाहे न माने । यद्यपि पहले पश्चिम भी धर्मका ऐसा ही माननेसे कोई विशेष स्वत्व पैदा नहीं होते, न अनन्य भक्त था जैसा कि इस समय भारतवर्ष । माननेसे कोई हानि नहीं होती। पर मध्यकालमें कई शताब्द तक वहाँ धर्मके कारण बड़ी अशांति मची रही । धर्ममदसे ___ यह तो रही पश्चिमकी धार्मिक अवस्था, अब उन्मत्त होकर समाजने बड़े बड़े विद्वानों और र रहा पूर्व । यद्यपि पूर्व में सर्वत्र ही धर्मका प्राधान्य संशोधकोंके साथ वह सलूक किया जो लुटेरे है तथापि भारतवर्षमें तो उसका एकाधिपत्य मालदारोंके साथ करते है । ५० वर्ष तक लगा राज्य है । यद्यपि यहाँकी शासनसत्ता पश्चिमी तार जारी रहनेवाला यूरोपका धर्मयुद्ध प्रसिद्ध लोगों के हाथमें होनेसे अब उसमें वह हस्तक्षेप ही है। इसलामने जो सलूक ईसाइयोंके साथ नहीं कर सकता, तथापि भारतीय समाजोंमें किया उसको जाने दीजिए, क्योंकि वह और उनकी विविध शाखाओंमें उसका अप्रतिएक भिन्न धर्म था। ईसाई धर्मकी ही दो बन्ध अधिकार है। हम जन्मसे लेकर मृत्युपशाखाओंने, जिनका नाम कैथलिक और प्रोटे यन्त चाहे किसी दशामें रहें, कुछ करें, धार्मिक स्टेन्ट है, एक दूसरेके साथ जैसे जैसे अत्या- बन्धनसे मुक्त नहीं हो सकते। चार और अमानुषिक बर्ताव किये हैं उनपर हमको केवल अपने पूजा-पाठ या संस्कारोंमें अब तक यूरोपका इतिहास रुधिरके आँसू बहा ही धर्मकी आवश्यकता नहीं किन्तु हमारा हर रहा है। इसलिए अब सभ्यता और उन्नतिके काम चाहे वह सामाजिक हो या व्यक्तिमत धर्मके Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522881
Book TitleJain Hiteshi 1920 Ank 04 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1920
Total Pages64
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size9 MB
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