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________________ mAMILLLLLUTIOLLARI ३८० र नैनहितैषी-. कार श्रीअभयदेवसूरिके शिष्य थे। इस ग्रंथका मूल कैसे कर्म उपार्जन कर सकता है और उनसे नाम तो 'आगमिक-वस्तुविचारसार' है; परन्तु किस प्रकार छुटकारा पा सकता है, इत्यादि संख्या ( इसकी मूल गाथायें ८६ हैं) के कारण समग्र विषयोंका अनुपम और अतिस्फुट वर्णन यह षडशीतिके नामसे विशेष प्रसिद्ध है। इस किया गया है । पर हरिभद्र, रामदेव, मलयगिरि और यशोदेव ५-सत्तरि ( सप्ततिका)। इस प्रकार ४ आचार्योंकी टीकायें हैं । इनके अतिरिक्त भाष्य, विवरण, अवचूरि और उद्धार यह ६ ठा कर्मग्रंथ कहा जाता है । उपर्युक्त " प्राचीन अथवा नवीन पाँचों ग्रंथोंका क्रमपूर्वक आदि संक्षिप्त प्रबंध भी उपलब्ध होते हैं। ५-शतकके कर्ता वही शिवशर्मसरि हैं जो अध्ययन किये बाद इसका अध्ययन किया कम्मप्पयडीके कर्ता हैं । यह ग्रंथ भी कम्मप जाता है। इसका कोई विशेष नाम न होनेसे यडीके सदृश अग्रायणी नामके दूसरे पूर्वके । गाथाओंकी संख्या (७०) परहीसे इसका उक्त कर्मप्राभूतमेंसे उद्धृत किया हुआ है । न नाम प्रसिद्ध है । इसके बनानेवाले पंचसंग्रहइस पर प्राचीन भाष्य और विस्तत चर्णिके कार श्रीचंद्रर्षि महत्तर हैं । इस पर सूत्रकारकी अतिरिक्त मलधारि हेमचंद्रसूरिकी विस्तृत टीका, - निजकी ( स्वोपज्ञ ) वृत्ति है जो प्राकृतभाषामें उदयप्रभका प्पिण और गणरत्नसरिकी अवचरि है। दूसरा टाका श्रामलयागारसारका का हर्ड भी विद्यमान है। है जो अच्छी सरल और विस्तृत है। मूलके ४-नवीन कर्मग्रंथपंचक। अर्थोंका अनुसंधान करनेवाला नवांगवृत्तिकार ___ श्रीअभयदेवसूरिका प्राकृत भाष्य और उस पर ऊपर जिन प्राचीन कर्मग्रंथोंका वर्णन किया मेरुतंगसरिका संस्कृत विवेचन इस ग्रंथके गया है, उन्हींके नाम पर श्रीदेवेन्द्रसूरिने, विषयोंको विशेष स्फुट करता है। इनके अतिविक्रम संवत् १३०० के लगभग, पाँच नवीन रिक्त रामदेवका टिप्पण और गुणरत्नसूरिकी ग्रंथ बनाये हैं। इनमें विषय भी वही है जो अवचरि भी लपलब्ध होती है । प्राचीनोंमें हैं। इन ग्रंथोंके कर्ताने अपनी निज ६-सार्द्धशतक । की टीकासे विभूषित कर, ग्रंथोंकी उपादेयतामें वृद्धि की है। यह टीका बहुत सरल स्पष्ट और इसका मूल नाम ‘सूक्ष्मार्थविचारसार ' विस्तृत है। इसमें पूर्वापरके संबंधोंका अनसन्धान है, परंतु ऊपरके कितने एक ग्रंथोंकी तरह इसका बड़ी उत्तमतासे किया है। आज कल विशेष . भी नाम गाथाओंकी संख्याका सूचक पड़ गया पठन पाठन इन्हीं ग्रंथोंका प्रचलित है। इन पर है है। इसके कर्ता जिनवल्लभसूरि हैं। इस पर एक पिछले विद्वानोंने, गुजराती भाषामें अनेक विस्तृत ह - हरिभद्रकी और दूसरी धनेश्वरसूरिकी टीका विवेचन लिखे हैं जिससे संस्कृतानभिज्ञ भी इन मिलता है । मिलती है। मुनिचंद्रसूरिकी चूर्णि तथा एक ग्रंथोंका अच्छी तरह परिशीलन कर सकता है। भाष्य और टिप्पण भी प्राप्त होता है। ___ इन पाँचों ग्रंथोंमें, कर्मोके भिन्न भिन्न स्वरूप, ७-संस्कृत कर्मग्रंथचतुष्क । उनके पृथक् पृथक् स्वभाव, अवान्तर भेदोपभेद, ऊपरके सब ग्रंथ मूल प्राकृतमें हैं, पर इनकी बंधनप्रकार, जीवके साथ बंधे हुए कर्मपुद्गलोंका रचना संस्कृतमेंकी गई है । इन चारों ग्रंथोंके स्थिति काल, कर्मबंधनके कारण कौन जीव नाम कमसे ये हैं-१ प्रकृतिविच्छेद, २ सूक्ष्मा Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522827
Book TitleJain Hiteshi 1916 Ank 07 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1916
Total Pages106
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size13 MB
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