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शाकटायनाचार्य।
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अर्थात् आर्य जिननन्दिगाण आर्य सर्वगुप्त शाकटायनकी जितनी टीकायें उपलब्ध गणि और आर्य मित्रनन्दिके चरणोंके समीप हैं प्रायः वे सब दिगम्बरविद्वानोंकी ही हैं। बैठकर तथा भले प्रकार सूत्र और अर्थको सम- यदि शाकटायन शुद्ध श्वेताम्बर होते, तो झकर पाणिपात्रभोजी शिवार्यने अपनी शक्तिके दिगम्बर विद्वान् उनके ग्रन्थ पर इतनी टीकायें अनुसार आराधना शास्त्रकी रचना की। कदापि न लिखते । श्वेताम्बर सम्प्रदायके
इनके सिवाय शाकटायनमें सिद्धनन्दि, विद्वानोंका शायद ही कोई ग्रन्थ ऐसा होगा ( पूज्यपाद ) और आर्यवज्र ( वज्रनन्दि ) जिसकी टीका किसी दिगम्बर विद्वान्की की इन दो दिगम्बराचार्योंका भी उल्लेख है जिनके हुई हो। विषयमें पहले कहा जा चुका है।
शाकटायन अपनेको 'श्रुतकेवलदेशीयाइससे मालूम होता है कि शाकटायन चार्य' पदसे परिचित करते हैं; परन्तु जहाँ तक यदि श्वेताम्बर सम्प्रदायके समाश्रमण आदि हम जानते हैं दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों मुनियों का उल्लेख करते हैं तो साथ ही ही सम्प्रदायोंमें शककी आठवीं शताब्दि तक विशेषवादी आदि दिगम्बर विद्वानोंकी भी श्रुतकेवलियों या एकदेशश्रुतकेवलियोंका सद्भाप्रशंसा करते हैं । इस लिए इससे वे श्वेता. व नहीं माना गया है। ऐसे ज्ञानियोंका अभाव म्बर या दिगम्बर नहीं ठहर सकते। दोनों सम्प्रदायोंके मतसे बहुत पहले हो चुका
यह तो मालून हो गया कि यापनीय- है; पर यापनीय संघमें इस बातका नियम संघ दिगम्बर सम्प्रदायसे अमक अमक नहीं मालूम होता और यही उसकी दोनोंसे बातोमें विभिन्नता रखता है; परन्त यह भिन्नता है । चिन्तामणिके कर्ता यक्षवर्माने तो मालूम न हुआ कि श्वेताम्बर सम्प्रदायके साथ
उनको 'सकलज्ञानसाम्राज्यको पानेवाला' उसकी क्या विभिन्नता है-यद्यपि यह निश्च
' माना है और यह भी यापनीय संघके सि
द्धान्तके अनुसार जान पड़ता है। य है कि हरिभद्रसूरि जैसे विद्वान् यापनीय तंत्रका एक स्वतंत्र सम्प्रदायके रूपमें उल्लेख
देवसेनसरिने यापनीय संघकी उत्पति करते हैं, अतएव यापनीय श्वेताम्बर सम्प्र
' विक्रम मृत्युके ७०५ वर्ष बाद बतलाई है।
यदि इसे विक्रमसंवत् ७०५ मान लें तो समदायका कोई गण या गच्छ नहीं हो सकता है। , इसका पता तब लग सकेगा जब यापनीयसं- वर्ष पहले इस संघकी उत्पत्ति हो चुकी थी।
है। झना चाहिए कि शाकटायनसे लगभग २०० घका थोड़ा बहुत धार्मिक साहित्य उपलब्ध हो। परन्त इसमें एक विरोध यह उपस्थित होता श्वेताम्बर दिगम्बर साहित्य तो इस विषयमें है कि हरिभद्रसूरिने अपनी ललितविस्तरामें सर्वथा मौन है। यह संघ दक्षिण कर्णाटककी यापनीय तंत्रका उल्लेख किया है जिससे और विशेष रहा है, अतएव संभव है कि मालूम होता है कि उनसे भी पहले इस उस ओर इसका कुछ साहित्य उपलब्ध हो। संघका अस्तित्व था और हरिभद्रसूरिका
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