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________________ ३६० __+ जैनहितेषी जनहितमा ऐसा ही पाठ श्रीयशोविजयोपाध्यायने भी श्वेताम्बरता अधिक मालूम होती है । देवसे. शास्त्रावर्तासमुच्चयमें लिखा है। नसूरि भी श्रीकलश नामक श्वेताम्बरके द्वारा इससे सिद्ध है कि यापनीय संघ स्त्रीमुक्ति, इसकी स्थापना बतलाकर इस बातकी पुष्टि करते केवलिभुक्ति और मुनियोंके लिए वस्त्रधारण हैं, परन्तु इससे यह नहीं कहा जा सकता इन तीनों बातोंको मानता था। कि यापनीय संघ श्वेताम्बर ही था। प्रो. प्रो० पाठकने अमोघवृत्तिसे नीचे लिखे पाठकके अमोघवृत्तिके उद्धरणों में जहाँ क्षमावाक्य उद्धृत करके बतलाया है कि शाक- श्रमण, आवश्यक, नियुक्ति, आदि श्वेताम्बर टायन श्वेताम्बर थे: आचार्य और ग्रन्थोंका उल्लेख है वहीं वे अथो क्षमाश्रमणैस्ते ज्ञानं दीयते। (अमोघ० सर्वगुप्त और विशेषवादी जैसे दिगम्बर १।२।२०१) विद्वानोंका भी उल्लेख करते हैं। ये विशेष. __ अथो क्षमाश्रमणैर्मे ज्ञान दीयते । वादी कवि वे ही हैं जिनका स्मरण वादिराज(१।२। २०२) एतकमावश्यकमध्यापय अथो एनं सूरिने अपने पार्श्वनाथचरितमें किया है:यथाक्रमं सूत्रम् । ( १ । २ । २०३) विशेषवादिगीर्गुम्फश्रवणाबद्धबुद्धयः । इयमावश्यकमध्यापय अथो एनं यथा- अक्लेशादधिगच्छन्ति विशेषाभ्युदयं बुधाः। क्रमं सूत्रम् । (१।२ । २०४) । इनका बनाया हुआ 'विशेषाभ्युदय' नामका भवता खलु छेदसूत्रं वोढव्यं । नियुक्तीरधीश्व । नियुक्तीरर्धाते। (४।४।१३३-४०) कोई काव्य है । शाकटायन अपने उक्त उपसर्वगुप्तं व्याख्यातारः। उपविशेषवा- उदाहरणमें कहते हैं-'उपविशेषवादिनं कवयः' दिनं कवयः। (१।३।१०४) अर्थात् और सब कवि विशेषवादीसे नीचे हैं। कालिकासूत्रस्यानध्यायदेशकालाः पठिताः पाठता सर्वगुप्तको वे व्याख्याता बतलाते हैं और माया (३ । २ । ७४) • ऊपरके वाक्योंमें श्वेताम्बराचार्योंका, ये वे ही जान पड़ते हैं जिनके चरणोंके समीप उनके कार्योंका, तथा श्वेताम्बरसम्प्रदायके बठकर शि बैठकर शिवायन या शिवार्यने भगवती आराआवश्यक नियुक्तिके अध्ययन करनेका धनाकी रचना की थी:जिक्र शाकटायनने किया है। इससे वे श्वेता अज्ज जिणणंदि गाण ताम्बर मालूम होते हैं। परन्तु हमारी समझमें सव्वगुत्तगणि अजमित्तणदीणं । उन्हें श्वेताम्बर या दिगम्बर कहनेकी अपेक्षा अवगमिय पादमूले सम्म सुत्तं च अत्थं च ॥ यापनीय कहना ही ठीक मालूम होता है । पुवायरियणिबद्धा यह एक तीसरा ही सम्प्रदाय था जो बहुत उपजीवित्ता इमा ससत्तीए । पुराने समयमें उत्पन्न हुआ था और न जाने आराधणा सिवजण कबका लुप्त हो चुका है । अवश्य ही इसमें पाणिदलभोजिणा रइंदा। Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522827
Book TitleJain Hiteshi 1916 Ank 07 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1916
Total Pages106
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size13 MB
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