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________________ ·६०६ जैनहितैषी इससे पतिवियोगमें दुख कर, भला न पाप कमाना है, किन्तु स्व-पर-हितसाधनमें ही, उत्तम योग लगाना है ॥ ( ६ ) आत्मोन्नतिमें यत्न श्रेष्ठ है, जिस विधि हो उसको करना, उसके लिए लोकलजा अपमानादिकसे नहिं डरना । जो स्वतंत्रता लाभ हुआ है, दैवयोगसे सुखकारी, दुरुपयोगकर उसे न खोओ, जिससे हो पीछे ख्वारी ॥ ( ७ ) माना हमने, हुआ, हो रहा, तुमपर अत्याचार बड़ा, साथ तुम्हारे पंचजनोंका, होता है व्यवहार कड़ा । पर तुमने इसके विरोधमें, किया न जब प्रतिरोध खड़ा, तब क्या स्वत्व भुलाकर तुमने किया नहीं अपराध बड़ा ? " ( 6 ) स्वार्थसाधु नहिं दया करेंगे, उनसे इस अभिलाषाकोछोड़, स्वावलम्बिनी बनो तुम, पूर्ण करो निज आशाको सावधान हो स्वबल बढ़ाओ, निजसमाज उत्थान करो, ' दैव दुर्बलोंका घातक ' इस नीतिवाक्यपर ध्यान करो ॥ ( ९ ) बिना भावके बाह्यक्रियासे, धर्म नहीं बन आता है, रक्खो सदा ध्यानमें इसको, यह आगम बतलाता है । भाव बिना जो व्रत नियमादिक, करके ढोंग बनाता है, आत्मपतित होकर वह मानव, ठग-दंभी कहलाता है ॥ (१०) इससे लोकदिखावा करके, धर्मस्वाँग तुम मृत धरना, सरल चित्तसे जो बन आए, भावसहित सोही करना । Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522808
Book TitleJain Hiteshi 1914 Ank 10 11
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1914
Total Pages160
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size8 MB
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