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________________ ४७८ जैनहितैषी इसका अर्थ वंश या शिष्यपरम्परा ही होती है । अर्थात हस्तिमल्लका कथन केवल इतना है कि शिवकोटि और शिवायनकी वंशपरम्परामें वीरसेनस्वामी हुए । पट्टावलीमें भी यह कहीं नहीं कहा कि वे उनके शिष्य थे। फिर आपने यह आविकार कहाँसे कर डाला ? जरा सोचिए तो सही कि समन्तभद्र और वीरसेन स्वामीके समयमें कितना अन्तर है ? उन्हें आपकी पट्टावलियोंके अनुयायी तो विक्रमकी दूसरी शताब्दीका मानते हैं और श्रीयुत सतीशचन्द्र विद्याभूषण आदि ईसाकी छठी शताब्दिमें मानते हैं। पर वीरसेन स्वामी विक्रमकी नववीं शताब्दिके विद्वान् हैं । हरिवंश और आदिपुगणके कर्ता दोनोंने पूज्यपाद स्वामीका स्तवन किया है और पूज्यपादने अपने व्याकरणमें समन्तभद्रके व्याकरणका उल्लेख किया है, अतएव वे उनसे भी प्राचीन हैं। आवश्यकता होनेपर इस विषयमें और भी वीसों प्रमाण दिये जा सकते हैं कि समन्तभद्र और वीरसेनके बीचमें कमसे कम २००. २५० वर्षका अन्तर अवश्य है । कहाँ तो आपकी ऐसी भद्दी नासमझी और कहाँ चौथे अंकका आसमानसे बातें करनेवाला ऐतिहासिक अभिमान ! सचमुच ही हमें इससे बड़ा आश्चर्य होता है। जिनदत्तचरित्र गुणभद्रका बनाया हुआ स्वतंत्र ग्रन्थ है । यह प्राप्य भी है । परन्तु भास्करसम्पादक इसे उत्तरपुराणका ही एक भाग बतलाते हैं । इसीसे तो पता लगता है कि आपने उत्तरपुराणका स्वाध्याय कितने मनोयोगसे किया है। जिनसेन और गुणभद्रके विषयमें भास्करमें जो कुछ लिखा गया Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522806
Book TitleJain Hiteshi 1914 Ank 07 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1914
Total Pages136
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size11 MB
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