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जैनसिद्धान्तभास्कर।
कि शक संवत् ८१० में उत्तरपुराण समाप्त हुआ । गुणभद्रने अपने संघका परिचय भी काफी दे दिया है । अच्छा होता यदि आप लेख लिखते समय एकबार प्रशस्तिको अच्छी तरह बाँच जाते। इनके समयनिर्णयको आपने जो महाकष्टसाध्य बतलाया है सो भी ठीक नहीं । इनके समय निर्णयके तो इनके ग्रन्थोंमें ही अनेक सुलभ साधन मौजूद हैं। __आगे आपने कालिदास और जिनसेनकी समकालीनता दिखलाने वाली कथाका उल्लेख करके उसको ठीक बतलाया है । पर वह निरी गप्प है। उसके सिद्ध करनेके लिए आपने २-३ किरणमें एक लेख लिखा है, पर अभी तक वह अपूर्ण ही है; चौथी किरणमें भी आपको उसके पूर्ण करनेका अवकाश न मिला ! खैर, तो उसे पूरा हो जाने दीजिए, हम भी उसके विषयमें तभी कुछ लिखेंगे। __ आगे आप लिखते हैं कि समन्तभद्रके शिष्य शिवकोटि, शिवकोटिके वीरसेन और उनके जिनसेन थे, अर्थात् वीरसेन समन्तभद्रके प्रशिष्य थे ! इस बड़ी भारी भद्दी भूलका कारण यह है कि एक तो सेठ जी स्वयं संस्कृत नहीं जानते हैं और दूसरे पट्टावलियों पर आपको केवलीके वचनों जैसी श्रद्धा है । हस्तिमल्ल कवि अपने नाटककी प्रशस्तिमें समन्तभद्र और उनके दो शिष्य शिवकोटि और शिवायनका उल्लेख करके कहते हैं:
तदन्यवाये विदुषां वरिष्ठः स्याद्वादनिष्ठः सकलागमज्ञः । श्रीवीरसेनोजनि तार्किकश्रीः प्रध्वस्तरागादिसमस्तदोषः। इस श्लोकमें जो यह पद है कि उनके ' अन्ववायमें ' सो
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