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________________ जैनसिद्धान्तभास्कर। ४७१ करनेवाले ' क्रमशो ' की जगह ‘क्रमणो' पाठ मानकर एक 'क्रमण' नामक आचार्यका आविष्कार करते हैं और साथ ही · नागसेन' का अस्तित्व ही मिटा देते हैं ! ' जयनामानुगांकः नहीं ' जयनागानुगांकः' पाठ है जिसका अर्थ जयसेन और नागसेन होता है। इसके बाद उत्तरपुराणकी प्रशस्ति दी है। उसमेंसे मालम नहीं कि ५-६-७-८ श्लोक क्यों छोड़ दिये ? वे तो इतिहासकी दृष्टि से बहुत महत्त्वके हैं। उनमें वीरसेनस्वामीका परिचय दिया गया है और उनके बताये हुए 'सिद्धभूपद्धतिः' नामक ग्रन्थका उल्लेख किया गया है। श्लोक ज़रा कठिन अवश्य है, शायद इसीलिए अनुवादकमहाशयने उनको छोड़ दिया हो। खैर, इच्छा उनकी ! ___ इसी प्रशस्तिके १३-१४-१५ श्लोकोंमें यह बतलाया है कि जिनसेनके सतीर्थ या गुरुभाई दशरथगुरु थे और गुणभद्र इन दोनोंके शिष्य थे ( शिष्यः - श्रीगुणभद्रसूरिरनयो आसीजगद्विश्रुतः )। इन श्लोकोंमेंसे पहलेके अर्थमें तो आप कहते हैं कि " चन्द्रमाके सहवर्ती आकाशके एक नेत्र सूर्यकेसे दशरथगुरु जिनसेनाचार्यके सहधर्मी हुए ।" परंतु आगे ६-७ पंक्तियोंके बाद ही १५ वें श्लोकके अर्थमें फरमाते हैं--" दशरथगुरु और गुणभद्राचार्य जिनसेन के प्रिय शिष्य हुए।" बाहरी इतिहासज्ञता ! तुझे धन्य है जो दशरथगुरुको जिनसेनका सतीर्थ भी बतलाती है और शिष्य भी बतलाती है ! ऐसी इतिहासज्ञताके बिना हम जैसोंको इतिहासकी शिक्षा कैसे दी जा सकती ? आगे १६-१७-१८-१९- श्लोकोंका यह कुलक है:कविपरमेश्वरनिगदितगद्यकथामातृकं पुरोश्चरितं । सकलच्छन्दोलन्कृतिलक्ष्यं सूक्ष्मार्थ गूढपदरचनम् ॥१६॥ व्यावर्णनोरुसारं साक्षात्कृतसर्वशास्त्रसद्भावम् । अपहस्तितान्यकाव्यं श्रव्यं व्युत्पन्नमतिभिरादेयम् । Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522806
Book TitleJain Hiteshi 1914 Ank 07 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1914
Total Pages136
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size11 MB
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