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जैनसिद्धान्तभास्कर।
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वर्च कर चुके हैं ! वे एक व्यापारी पुरुष हैं, इससे संभव है कि उन्हें अवकाश कम मिलता होगा और वे इस ओर यथेष्ट लक्ष न दे सकते होंगे। ऐसी अवस्थामें यदि भास्कर समय पर नहीं निकलता है और उसका सम्पादन योग्यतापूर्वक नहीं होता है तो हम केवल यही कह सकते थे कि सेठजी. अपने कर्तव्यके पालन
प्रमाद कर रहे हैं उन्हें इस कार्यमें अपना विशेष समय और चेत्त लगाना चाहिए; इससे अधिक कहनेका हमें कोई अधिकार न पा। सेठजी भी इतना ही कहकर छुट्टी पा सकते थे कि क्या किया नाय, अवकाशाभावसे हम भास्करको समय पर नहीं निकाल सकते है और जैसा चाहिए वैसा सम्पादन भी नहीं कर सकते है । अन्तु चौथे अंकसे मालूम हुआ कि सेठजी अपने इस विलम्ब या प्रमादको और साथ ही अपनी अयोग्यताको भी अपनी प्रतिष्ठाका कारण बनाना चाहते हैं । इसका भी उन्हें बेहद अभिमान हैं । वे लिखते हैं “ यह कार्य ऐसा है वैसा है, गंभीर है अन्धकारमें है, इसमें अटूट परिश्रम करना पड़ता है, एक एक लेखको बीसों बार लिखना पड़ता है, वर्षों खोजें करनी होती हैं, देरसे निकलने पर भी भास्करने बहुत कार्य किया है, क्या किया है सो अमुक विद्वानके ज्याख्यानसे मालूम होगा, इतिहासके सभी पत्र देरीसे निकलते हैं, बंगाल एशियाटिक सुसाइटी जैसी साधनबहुल विशाल संस्थाओंके जनरल तीन तीन चार महीनेकी देरीसे निकलते हैं तब पाठक ही सोचें कि भास्कर देरीसे निकलता है या जल्दी ? यह इतना कठिन काम है कि यदि भास्कर त्रिमासिककी जगह त्रैवार्षिक भी बनाया
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