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जैनहितैषी
पड़ती । परमहंसको जबर्दस्ती कुछ दिनोंके लिए जीता रखकरः उसके द्वारा शास्त्रार्थ करवाया है और आखिर उसे फिर मरवा दिया है । इसकी गढन्त साफ़ मालूम होती है। ... ३ तीसरे प्रभावकचरितसे पहलेका कोई ग्रंथ ऐसा देखनेमें नहीं
आया जिसमें इसका उल्लेख हो । हरिभद्रके ग्रन्थोंमें भी इसका कोई आभास नहीं मिलता।
४ हंसके शास्त्रार्थकी बात यदि ऐतिहासिक होती तो श्वेताम्बरसम्प्रदायके और और ग्रन्थोंमें अवश्य मिलती; पर नहीं मिलती ।
४ चौथे सबसे बड़ा प्रमाण कथाके इस भागके कल्पित होनेमें यह है कि राजशेखरसूरि ( श्वेताम्बर ) के चतुर्विशतिप्रबन्ध नामक ऐतिहासिक ग्रन्थमें इस बातका नाम मात्रको भी उल्लेख नहीं है कि एक भाईके मारे जाने पर दूसरा भाई किसी राजाकी शरणमें गया और वहाँ उसने बौद्धोंसे शास्त्रार्थ किया, या देवीका पराजय किया । चतुर्विशतिप्रबन्ध विक्रमसंवत् १४०५ का बना हुआ है। जब इसमें हंसके शास्त्रार्थादिका जिक्र नहीं है, तब यह बात बिलकुल स्पष्ट हो जाती है कि प्रभावकचरितके कर्त्ताने कथाका उत्तरार्ध अकलंकदेवकी कथासे ही उड़ाया है-चाहे वह मल्लिषेणप्रशस्तिसे उड़ाया हो या किसी दिगम्बरकथाग्रन्थसे उड़ाया हो। यह नहीं हो सकता कि चतुर्विशति प्रबन्धके कर्ताने संक्षिप्तताके खयालसे उक्त बातका जिक्र नहीं किया हो । नहीं, उन्होंने जिस प्राचीनग्रन्थके आधारसे उक्त कथा लिखी होगी उसमें यह भाग
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