SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 39
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ भट्टाकलङ्कदेव | ४२३ कनड़ी भाषामें : राजावलीकथे ' नामका एक ग्रन्थ है । इसमें जैन इतिहासकथाओंका संग्रह है । ईसाकी १९ वीं शताब्दिके प्रारंभमें देवचन्द्र नामक कविने मैसूर राजवंशकी ' देवीरम्भ ' नामक एक स्त्रीके लिए इस ग्रन्थकी रचना की थी । इस ग्रन्थके आधारसे राइस साहबने अपनी ' इन्स्क्रिप्शन्स एट श्रवणबेलगोला ' नामक प्रसिद्ध पुस्तक में लिखा है कि अकलङ्कदेव सुधापुरके देशीयगणके आचार्यपद पर प्रतिष्ठित हुए थे और यह स्थान उत्तर कनारामें है । इस समय नार्थकनारामें जो ' सोड' नामका नगर है वही प्राचीन सुधापुर । राइस साहबने विलसन साहबकी ' मैकेंजी कलेक्शन ' ( Mccke-nzie collection ) नामक पुस्तककी प्रस्तावनाके आधारसे यह भी लिखा है कि पोनतग ( Pontaga ) के बौद्धकालिजमें अकलङ्कदेवने शिक्षा पाई थी और यह स्थान ट्विटूरके निकट बंतलाया जाता है । 1 अकलङ्कदेवके विषयमें जो कई कथायें हैं उनके अनुसार वे जन्मसे ब्रह्मचारी रहे और विद्या प्राप्त करके दिगम्बराचार्यके पदको प्राप्त हो गये । विद्याकी प्राप्तिमें उन्होंने बहुत कष्ट उठाये । वे किसी 1 बौद्ध विद्यालय में भी पढे थे । वे देवसंघके आचार्य बतलाये जाते हैं । देशीयगण जिसका उल्लेख देवचन्द्रने किया है इसी संघका एक गच्छ है । पर इसके लिए कोई पुष्ट प्रमाण नहीं मिलता । अकलंकदेवने स्वयं अपने ग्रन्थोंमें अपने संघका उल्लेख नहीं किया; अपनी गुरुपरम्परा तो बड़ी बात है अपने गुरु तकका भी वे कहीं उल्लेख नहीं करते हैं । मंगराज कविका शक १३५५ का लिखा हुआ एक Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522806
Book TitleJain Hiteshi 1914 Ank 07 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1914
Total Pages136
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size11 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy