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पद्मनन्दि और विनयसेन ।
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विनयसेनका दीक्षित था । अर्थात् विनयसेनमें दीक्षा देनेकी योग्यता थी। दूसरे देवसेनकी गाथाओंमें जो यह लिखा है कि जिनसेन श्रीपद्मनन्दिके पश्चात् चारों संघका समुद्धरण करनेमें धीर हुए, सो यही बतलाता है कि जिनसेनके पहले पद्मनन्दि चारों संघोंके उद्धारका कार्य करते थे अर्थात् आचार्य थे। चार संघमें मुनि भी शामिल हैं और उनका उद्धरण या उद्धार या शासन आचार्य ही कर सकता है, साधारण मुनि या विद्वान् नहीं। इसी तरह आगेकी गाथामें स्पष्ट कहा है कि विनेयसेनकी मृत्यु होने पर गुणभद्रने सिद्धान्तोंका घोषण किया, अर्थात् इसके पहले विनयसेन यह काम करते थे और कुमारसेन उसी समयका दीक्षित था।
१. सेनगणकी पट्टावली कोई प्रामाणिक पट्टावली नहीं है। यदि आप थोड़ीसी भी बुद्धि लगाकर विचार करते, तो उसके जोर पर इतनी उछल कूद मचानेको तैयार न होते। मैंने हितैषीके उक्त पिछले अंकमें लिखा था कि सेनगणकी पट्टावलीका लेखक जिनसेनाचार्यको धवल-महाधवल-पुराणादि सब ग्रन्थोंका रचयिता और गुणभद्रको ग्यारह अंग चौदह पूर्वका ज्ञाता बतलाता है । इसीसे उसकी विद्वत्ताका पता लगता है; परन्तु आपने उसकी ओर ज़रा भी ध्यान न दिया। उक्त पट्टावली कितनी रद्दी और कल्पित है, इसका विचार हमने भास्करकी समालोचनामें भी किया है। यहाँ इतना ही कहना वस है कि उसको प्रमाण मानकर आप देवसेनके दर्शनसारको अप्रमाणिक नहीं ठहरा सकते । हमसे आप सेनगणकी दूसरी प्रामाणिक पट्टातली माँगते हैं; सो यह काम तो आपका है। यदि
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