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जैनहितैषी -
श्रीगोल्लाचार्य नामक प्रसिद्ध शिष्यका उल्लेख है । इसी तरह ४८ थ लेखमें दिवाकरनन्दिके शिष्य मलधारी देव और उनके शिष्य शुभर चन्द्रदेवका उल्लेख है । इस तरहके और भी अनेक उदाहरण दिौर जा सकते हैं जिससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उक्त नामान्तपदोंवे नियमका कहीं कहीं उल्लंघन भी किया जाता था। संभव है दिन ' पद्मनन्दि ' नाम भी उसी अपवादका एक उदाहरण हो ।
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४ भास्करके द्वितीय - तृतीय अंकमें मङ्गराज कविका एक शिलाभ लेख प्रकाशित हुआ है जो १३५५ शक्रः संवत्का लिखा हुआ है ।" उसके श्लोक १८-१९-२० - २१ में लिखा हुआ है कि - भट्ट अकलंकदेव के स्वर्गवास होनेके बाद देव, नन्दि, सिंह, सेन ये चार संघ हुए । यदि यह बात ठीक हैं तो कहना होगा कि लगभग वीरसेन और पद्मनन्दि स्वामीके समय हीं सेनसंघ भेद हुआ होगा ' और इस लिए यह बहुत संभव है कि उस समय नामके विषय में यह नियम न बना हो कि सेनसंघके आचार्य के नामान्तमें सेन या भद्रादि होना ही चाहिए । गुणभद्र स्वामी उत्तरपुराणकी प्रश स्तिमें अपने सेनसंघका उल्लेख करते हुए 'वीरसेन' से ही उसकी परम्परा शुरू करते हैं । इससे भी मंगराज कविके कथनक सत्यता प्रतीत होती है । अभी तक अकलंकदेवसे पहलेके बने हुए किसी भी ग्रन्थमें या शिलालेखादिमें इन नन्दि आदि संघोंका उल्लेख ही मिलता है । पद्मपुराणमें संघका जिक्र भी नहीं, भगनवती आराधना में भी नहीं, अकलंक, विद्यानन्द, माणिक्यनन्दि प्रभाचन्द्र, समन्तभद्र, पूज्यपाद आदि के ग्रन्थोंमें नहीं और ये ही सब
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