________________
जैनहितैषी -
पीछे ही वह लिखा गया है । इससे बीसों कल्पित आडम्बरपूर्ण पट्टता वलियोंकी अपेक्षा उसकी कीमत अधिक है ।
४१२
1
२ विनयसेनके आचार्य होनेमें तो कोई भी सन्देह नहीं होत सकता । कारण, एक तो कुमारसेन उनका दीक्षित शिष्य था, ऐसा दर्शनसारसें स्पष्ट लिखा है और दीक्षा वही दे सकता है जो संघका आचार्य होता है। दूसरे जिनसेन स्वामीकी मृत्यु शक ७६५ के लगभग हुई है और गुणभद्रने महापुराणको शक ८२० में किया है । बीच में वह बहुत समय तक अधूरा पड़ा रहा है और इसका कारण यही मालूम होता है कि गुणभद्रके पहले विनयसेन आचार्य हुए थे और किसी कारणसे उन्होंने उसे बनाना ठीक न समझा होगा। संभव है कि उनमें काव्य रचनेकी ही प्रतिभा न होगी । यह नियम नहीं कि जो विद्वान् हो उसे ग्रन्थकर्त्ता होना ही चाहिए । विद्वत्ता एक बात है और ग्रन्थकर्तृत्व दूसरी बात है । तीसरे विनयसेनका उल्लेख स्वयं जिनसेन स्वामीने पार्श्वभ्युदय काव्य में किया है और उन्हें अपना गुरुभाई और महामुनि बतलाया है - ( श्रीवीरसेनमुनिपादपयोजभृंगः श्रीमानभूद्विनयसेनमुनिर्गरीयान् ) । अतएव गुणभद्र शिष्यकी अपेक्षा उनकी दृष्टि विनयसेन सतीर्थकी योग्यता ही विशेष जँची होगी और इसलिए उन्होंने विनयसेनको ही आचार्यपद दिया होगा ।
३ वीरसेनके बाद पद्मनन्दि आचार्य हुए । इस विषय में सबसे बड़ी शंका यह है कि ' पद्मनन्दि ' यह नाम सेनसंघ के नामों सरीखा नहीं है किन्तु नन्दिसंघ सरीखा है, इस लिए वें वीरसेनके बाद
Jain Education International
For Personal & Private Use Only
www.jainelibrary.org