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________________ जैनहितैषी - प्रमाणोंके संग्रह करनेके लिए भी स्वयं भी कुछ प्रयत्न करना चाहिए; व्यर्थकी उछलकूद मचाना इतिहासज्ञता नहीं है | औरोंकी पूँजी पर — औरोंकी शक्ति पर और किसीको बुरा भला कहना ही और थोड़ी देर के लिए यह भी मान लिया जाय कि चन्द्रगुप्तका जैनत्व सर्वथा सिद्ध हो चुका है, उसके लिए युक्तियोंकी कमी नहीं; तो भी आप जिस भाषा में अपना पत्र निकालकर इतिहासज्ञ बन रहे हैं उसके पाठकों को तो वे युक्तियाँ मालूम होनी चाहिए, आपके जान लेनेसे ही क्या होता है ! भास्कर में जो कुछ लिखा गया है उसमें तो कुछ भी दम नहीं है । ५०० ७ जैन सिद्धान्तभवनकी चर्चा । हर्षका विषय है कि सहयोगी जैनमित्रका ध्यान भी आराके जैनसिद्धान्त भवनकी ओर आकर्षित हुआ है। उसने भी भवनके कार्यकर्त्ताओंकी शिथिलता बतलाई है और भवनको आरामें नहीं किन्तु काशीही प्रतिष्ठित करनेकी आवश्यकता बतलाई है । सहयोगीका यह कथन विशेष ध्यान देने योग्य है कि स्वर्गीय बाबू देवकुमारजी जो दानपत्र लिख गये हैं उसमें भवनको काशीमें ही स्थापित करनेकी बात लिखी है । यदि यह सही है तो फिर क्या कारण है कि बाबू साहबकी इच्छा के विरुद्ध भवनके लिए आरा जैसी छोटीसी जगह तजबीज की गई ! क्या कोई यह बतला सकता है कि भवनका काशीकी अपेक्षा आरामें रहना विशेष लाभकारी होगा : कहाँ काशी और कहाँ आरा ! आराका भवन आराका ही होकर रह जायगा; पर काशी -- विद्यापीठमें वह सारे भारतवर्षका बन जायग 1 Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522806
Book TitleJain Hiteshi 1914 Ank 07 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1914
Total Pages136
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size11 MB
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