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________________ ४८४ जेनहितैषी हस्तिमल्लकविका स्थान । दौर्बलिशास्त्रीके भंडारके अंजनापवनंजय नाटकके अन्तः लिखा है: " श्रीमत्पाण्ड्यमहेश्वरे निजभुजां दण्डावलम्बीकृतं कर्णाटावनिमण्डलं पदनतानेकावनीशेऽवति । तत्पीत्यानुसरन्स्वबन्धुनिबहैर्विद्वद्भिराप्तैस्समं जैनागारसमेतसन्तरनमे ( ? ) श्रीहस्तिमल्लोऽवसत् ॥ इति गोविंदभट्टारस्वामिनः सूनुना श्रीकुमारसत्यवाक्यदेवरवल्लभदयभूषणनामार्यमिश्राणामनुजेन कवर्धमानस्याग्रनेन कविना हस्तिमल्लेन विरचितम् ।' ___ पहले पद्यके चौथे चरणमें कोई अक्षर रह गया है इससे स्पष्ट नहीं हो सकता कि निवासस्थान कौनसा था । पाण्ड्यमहेश्वर नामक कर्णाटक नरेशके वह आधीन था। इससे समयका भी पता लग जायगा । हस्तिमल्ल कवि, श्रीगोविन्दभट्टके पुत्र थे । श्रीकुमार, सत्यवाक्य, देवरवल्लभ और उदयभूषण ये चार कवि उनके बड़े भाई और गणरत्नमहोदधिके कर्ता वर्धमानकवि छोटे भाई थे । अर्थात् ये छहों भाई विद्वान् थे। इस बातका परिचय उनके विक्रान्तकौरवीय नाटककी प्रशस्तिसे भी लगता है। ये दाक्षिणात्य थे और इनके पिता देवागमस्तोत्रको सुनकर जैन हो गये थे। (८) अर्हदास कवि। . अहंदासका — मुनिसुव्रतकाव्य ' एक सुन्दर काव्य है । दक्षिण Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522806
Book TitleJain Hiteshi 1914 Ank 07 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1914
Total Pages136
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size11 MB
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