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________________ जैनहितैषी .mmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmm सत्कार होता है । देखिए, अपने प्रकाशसे संसारका उपकार करनेवाला सूर्य जब अस्त होता है तब भी उसे अस्ताचल अपने सिरपर धारण करता है। मन्द करत जो करे भलाई । उमा सन्तकर यही बड़ाई ॥ सन्तोंका बडप्पन-तारीफ इसीमें है कि वे बुराई करनेवाले पर भी भलाई करते हैं। आधे दोहेमें कहो, सब ग्रन्थनिको सार। परपीड़ा सो पाप है, पुण्य सो पर उपकार॥ आचारकी उन्नति। ह मारे देशके पण्डित लोग आजकल सभी बातोंमें अवनति बतलाते हैं। वे कहते हैं कि आचारविचार, विद्या-विज्ञान, दयादाक्षिण्य, धर्मकर्म - आदि कोई भी बात ऐसी नहीं है जिसमें आजकलके लोग पूर्वकालके लोगोंकी बराबरी कर सकें; परन्तु मेरी समझमें यह उनकी निरी पण्डिताईकी बात है । मैं ऐसी सैकड़ों बातें बतला सकता हूँ जिसमें आजकलके लोग बहुत तरक्की कर गये हैं और जिनकी इतनी उन्नतिके विषयमें पूर्वके लोगोंने कभी कल्पना भी न की होगी। आज मैं सिर्फ एक बातका निवेदन करूँगा। Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.522803
Book TitleJain Hiteshi 1914 Ank 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathuram Premi
PublisherJain Granthratna Karyalay
Publication Year1914
Total Pages94
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jain Hiteshi, & India
File Size9 MB
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