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________________ 3८२ જનધર્મ વિકાસ उनकी उपस्थिति में ही यह लिखा गया था। जैन पट्टावलियों में आचार्य हेमवंतरि की पट्टावली अत्यन्त पुरातन मानी जाती है उसमें स्पड लिखा है कि कलिंग देश से राजा नंद जैन मूर्ति को मगध में ले गया। वह मूर्ति मगध के राजा श्रेणिकने स्थापित की थी। राजा श्रेणिक (बिंबसार) भगवान् महावीर का अनन्योपासक था यह बात उनकी जीवन संबंधी घटनाओं से स्पष्ट अवगत हो जाती हैं। इससे इस बात की सिद्धि और पुष्टि मीलती है कि कलिंग का मंदिर श्रेणिकने महावीर की मौजूदगी में ही बनवाया था। महात्मा बुद्ध सर्व प्रथम अपने धर्मतत्व का उपदेश करने के लिये राजगृहनगरमें पधारे तब वे सातवें तीर्थकर श्री सुपार्श्वनाथ के मंदिर में ठहरे थे ऐसा बौद्ध ग्रंथ "महावगा" में उल्लेख मिलता है उसमें इस मंदिर का नाम पाली भाषा में "सुप्पतित्थ" अर्थात् सुपार्श्व तीर्थ लिखा है। विशाला नगरी के स्तूप और मथुरा नगरी के खंडित स्तूप आज भी पार्श्वनाथ के पूर्व मंदिर और मूर्तिपूजा होने की सिद्धि करते हैं। भगवान् महावीर दीक्षा लेकर जब आबू के सन्निकट मुंडस्थल नामक मगर में प्रामानुग्राम धर्मदेशना देते हुए पधारे तब वहां राजा नंदीवर्धन आपके दर्शनार्थ आया। दर्शन कर बहुत प्रसन्न हुआ और प्रभु दर्शन की चिरस्मृति में वहां पर ही एक विशाल भव्य मंदिर बनवाया जिसके ध्वंसावशेष अद्यावधि विद्यमान हैं और जिसकी पुष्टि तत्रस्थ शिलालेख से हो जाती है। इस मंदिरकी प्रतिष्ठा केशी श्रमणाचार्य ने कराई थी। कच्छ भद्रेश्वर नगर में महावीर निर्वाण के २३ वर्ष पश्चात् का बना हुआ एक प्राचीन मंदिर अधुनापि विद्यमान है। इस मंदिर की प्रतिष्ठा भगवान् सौधर्मस्वामी के पुनीत करकमलों से हुई थी ऐसा इस मंदिर के शिलालेख से प्रमाणित होता है। __ ओसियां और कोरण्टा (मारवाड़) के महावीर मंदिर की प्रतिष्ठा वीर निर्माण के ७० वर्ष पश्चात् आचार्य रत्नप्रभ सूरि के हाथों से हुई थी। इससे सिद्ध होता है कि उक्त मंदिर द्वय २३९३ वर्ष के प्राचीन हैं। श्रावस्ती नगरीके भूगर्भ में से श्री संभवनाथ का एक मंदिर निकला है इसके संबंध में अन्वेषकोंका मत है कि यह मंदिर और इसके खण्डहर भगवान् महावीर के पूर्व के स्मारक है और स्वयं महावीर भी यहां पधारे हुए हैं। ऐसे एक नहीं अनेको प्रमाण मूर्तिपूजा की प्राचीनता को सिद्ध करने वाले मिलते हैं। वीर निर्वाण के पश्चात् के प्रमाणों के संबंध में कहना ही व्यर्थ है जब कि उनके पूर्व भी मंदिर और मूर्ति होने के प्रचुर प्रमाण मिलते हैं। भारतीय आर्यजनोंने तो मूर्ति को प्राचीन कालसे ही धर्म का एक खास स्वरूप मान रक्खा है किंतु चीन, जापान, आस्ट्रिया आदि दूरवर्ती देश भी प्राचीन काल से ही मूर्ति की उपासना करते आये हैं। विकम की चौदहवीं शताब्दी तक पौर्वात्य देशों के समान ही पाश्चात्य देशों में भी मूर्ति पूजा का प्रबल प्रसार एवं प्रचार था। उस समय उन देशों में भी जैन मंदिर विद्य
SR No.522524
Book TitleJain Dharm Vikas Book 02 Ank 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLakshmichand Premchand Shah
PublisherBhogilal Sankalchand Sheth
Publication Year1942
Total Pages38
LanguageGujarati, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Dharm Vikas, & India
File Size9 MB
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