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શાસ્ત્રસમ્મત માનવધર્મ ઔર મૂર્તિપૂજા. शास्त्रसम्मत मानवधर्म और मूर्तिपूजा. लेखक:-पू. मु. श्रीप्रमोदविजयजी महाराज. (पन्नालालजी)
(गतis Y४ ३५२ थी अनुसंधान.) उपरोक्त शिलालेख से स्पष्ट सिद्ध होता है कि भगवान् नेमिनाथ के शासन काल में भी जैन मंदिर और मूर्तिपूजा का प्रचुर प्रचार था इस बातकी विशेष सिद्धि और पुष्टि ज्ञाता सूत्र द्वारा द्रौपदी की प्रतिमा पूजाके प्रकरण से हो ही जाती है। द्रौपदी का काल भगवान् नेमिनाथ के समसामयिक ही था। भगवान् नेमिनाथ के समय में भी जैन मूर्तियों और मंदिरों की काफी प्रतिष्ठा थी। ___अनेक राजाओं और महाराजाओं ने तो अपने प्रचलित सिक्कों पर भी चैत्य के चिह्न अंकित करा दिये थे वे ही जैन चैत्यांकित प्राचीन सिक्के साम्प्र. तावस्था में भी उत्तर हिंद के इतस्ततः भूमितल में से निकलते हुए पाये जाते हैं। इन सिक्कों में से कितनेक तो मौर्य काल के समय के प्राप्त होते हैं जिन पर चैत्य का चिह्न अंकित मिलता है और जो २३०० वर्ष की प्राचीनता के सूचक हैं। ऐसे अनेक ऐतिहासिक प्रमाण मौझूद हैं जिनकी सिद्धि डॉ. त्रिभुवनदास लहेरचंद ने अपने प्राचीन भारतवर्ष के इतिहास के द्वितीय भाग में की है। तक्षशिला के पास पाश्चात्य अन्वेषकों ने अन्वेषण प्रयत्न द्वारा जो नगर खोज निकाला है उसके भूमिभाग में से एक ध्यानस्थ जैन मुर्ति जो ५००० वर्ष की प्राचीन है प्राप्त हुई है। इस प्रकार मूर्तियों की प्राचीनता के आधार पर जैन धर्म की प्राचीनता और सार्वभौम सत्ता का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। इस नगर का नाम "मोहन जोडेरा" है। सिंध और पंजाब की सरहद पर जो "हरप्पा" नामक नगर भू भाग से निकला है उस नगर में देवियों की मूर्तियां मिली हैं। यह नगर ५०१० वर्ष पुराना है। उडीसा प्रांत के खंडगिरि और उदयगिरि नामक दोनों पहाड अभी भी भारतीय आदर्श, भारतीय कला प्राधान्य और मूर्तियों की प्राचीनता की सिद्धि में विद्यमान हैं । जिनके संबंध में पुरा तत्ववेत्ताओं का कथन है कि ये पहाड़ पहिले जैन मंदिरों से विभूषित थे और यहां अनेक भक्त लोग संघ ले कर तीर्थयात्रा के निमित्त आते थे। इन्हीं पहाडों में साधुओं के ध्यान के लिये विविध गुफाएं भी थीं इन्हीं गुफाओं की भित्तियों पर जैन तीर्थंकरों की भव्य एवं दिव्यसुंदर काय मूर्तियां भी चिह्नित थी जिनके ध्वंसावशेष आज भी यत्र तत्र दिखते हैं। ईस्वी संवत् १८२० में पादरी स्टलिंग साहबने अन्वेषण करते हुए अपना ध्यान जब इन दोनों पहाडों की गुफाओं की ओर किया तो वहां उनको एक प्राचीनतम शिलालेख प्राप्त हुआ जिसको पुरातत्वक्षोंने भारतीय प्राचीन शिलालेखों में सर्व प्रथम स्थान दिया है। यह शिलालेख कलिंग देश के राना महामेघवहान चक्रवर्ती महाराजा खारवेल के समय का है।