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अपभ्रंश भारती 21
अभिव्यक्ति का मार्ग खोज निकालता है। फलतः लोक-धरातल पर नूतन भाषा एवं रूपों का जन्म होता है। यही साहित्य का नवीन युग होता है, जो एक ओर भावानुभूति के नये धरातल को उपस्थित करता है, तो दूसरी ओर तदनुरूप उसकी अभिव्यक्ति के लिए विविध उपादानों को जुटाता है। नयी भाषा-शैली, नये उपमान, नये छंद, नई रागनियाँ और नव्य कल्पनाएँ इसकी विशेषताएँ होती हैं। इनमें भी छन्द हमारी भावानुभूतियों के अनुरूप उन्हें सहज सुग्राह्य बनाते हैं, उन्हें रूप प्रदान करते हैं। प्रत्येक भाषा की प्रकृति और उच्चारण-पद्धति के अनुसार ये छन्द किसी न किसी नियम से परिचालित होते हैं। यही कारण है कि वैदिक तथा लौकिकसंस्कृत युग में वर्णिक छन्दों की ही प्रधानता रही। किन्तु, प्राकृत भाषा के समय मात्रिक छन्दों का अवतरण हुआ और अपभ्रंश-युग में उन मात्रिक छन्दों ने भी अन्त्यानुप्रास के सुयोग से एक दूसरा ही रूप धारण किया। ‘अनुष्टुप' वैदिकसंस्कृत का प्रधान छन्द था, तो 'श्लोक' लौकिक-संस्कृत का संदेश-वाहक बना। इसी प्रकार 'गाथा' प्राकृत के झुकाव का व्यंजक रहा और 'दोहा' अपभ्रंश का परिचायका
अस्तु, युग की प्रधान प्रकृति का संवाहक होने से काव्याभिव्यक्ति में छन्द का अधिक महत्त्व है। काव्य और संगीत दोनों लय पर अवलंबित हैं। लय स्वर की गति होती है तथा काव्य में छन्द लय के आधार पर टिका हुआ नाद-विधान है। वस्तुतः, छन्द एवं लय परस्पर एक-दूसरे के पूरक हैं। संगीत की भाँति स्वरों की योजना के कारण उनमें लय का विधान स्वतः होता है। लौकिक तथा मात्राछन्दों में ही नहीं, वैदिक तथा वर्ण छन्दों में भी यह सौजन्य मधुरता का कारण है। छन्द के माधुर्य एवं स्वर-संयोजन के लिए कवि को अपनी सौन्दर्य-बोधवृत्ति का सचेतन उपयोग करना पड़ता है। शब्दों के स्वीकृत रूप में ही वह विकार उत्पन्न नहीं करता अथवा नूतन शब्दों का निर्माण भी करता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि छन्दों की मूल प्रकृति तथा स्वभाव संगीत के समान ही हैं। संगीत का यह सौन्दर्य अपने नैसर्गिक तथा हृदयस्पर्शी-रूप में लोकगीतों की विशेषता है। यही कारण है कि छन्दों का उद्गम-स्रोत किसी-न-किसी प्रकार लोक-वाणी में ही निहित है। अनेक लोक-गीतों की धुनें तथा लोक-नृत्यों की ताले विविध छन्दों की मूलभूता हैं।