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________________ 36 अप्पा मेल्लिवि जगतिलउ जे परदव्वि रमंति। अणु कि मिच्छादिट्ठियह मत्थई सिंगई होंति ।। 71 ।। अर्थ जो जग में श्रेष्ठ (निज) आत्मद्रव्य को छोड़कर परद्रव्य में रमण करते हैं, वे मिथ्यादृष्टि हैं। अन्य क्या मिथ्यादृष्टियों के माथे पर सींग होते हैं? विषय-भोगों की अभिलाषा में लिप्त होना मिथ्यादृष्टि / अज्ञानी की पहचान है। — अपभ्रंश भारती 21 वस्तु का स्वरूप जैसा है वैसा नहीं समझना, यही भ्रांति है। इस सम्बन्ध में मुनिश्री कहते हैं मन की भ्रांति नहीं मिटने पर वही दिन गिनना पड़ते हैं। जिनमें मन विलय को प्राप्त नहीं होता और इसीलिये अक्षय, निरामय, परमगति आज भी उपलब्ध नहीं हुई ( गाथा 170 ) | आगे कहते हैं परमगति में मन फेंक कर छोड़ दे, आवागमन की बेल टूट जायेगी, इसमें भ्रांति मत कर (गा. 172 ) । तात्पर्य यह कि शुभाशुभ भाव छोड़कर निर्विकल्प आत्मानुभूति कर । - - तत्त्वज्ञान के अभाव में जीव भावकर्मों को अपना मानता है और वस्तुस्वरूप के विपरीत श्रद्धान करता है। दोनों की भिन्नता का ज्ञान भेदविज्ञान से होता है। 26 हे योगी! द्रव्यकर्म स्वयं अपनी योग्यता से मिलते बिछुड़ते हैं, इसमें कोई भ्रांति नहीं है (74)। आत्मज्ञान के लिए तत्त्व का निर्णय कर उसे धारण करना चाहिये। जैसा स्वाध्याय करते हैं, वैसा करना चाहिये । व्यर्थ भटकने से क्या लाभ? श्रद्धान, ज्ञान और चारित्र से कर्म सहज नष्ट हो जाते हैं ( 84 ) । यहाँ मुनिश्री ने तत्त्वविचार और तत्त्व - निर्णय की महत्ता बताई है। कपास को अध्यात्म साहित्य में क्रियाकाण्ड की अपेक्षा आत्मानुभव को श्रेष्ठ कहा है। सम्यक्त्व आत्मानुभूतिपूर्वक होता है। सम्यक्त्व बिना ज्ञान - चारित्र क ओटे बिना वस्त्र बनाने से तुलना की है। मुनिश्री कहते हैं। मूलु छंडि जो डाल चडि कहं तह जोयाभास । - चीरु ण वुण्णइ जाइ वढ विणु उट्टियां कपास ।।110॥ - अर्थ हे मूर्ख ? मूल को छोड़कर जो डाली पर चढ़ता है अर्थात् सम्यक् श्रद्धान के बिना ज्ञान-ध्यान करना चाहता है, उसके योग का अभ्यास कहाँ है ?
SR No.521864
Book TitleApbhramsa Bharti 2014 21
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani
PublisherApbhramsa Sahitya Academy
Publication Year2014
Total Pages126
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Apbhramsa Bharti, & India
File Size7 MB
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