________________
34
अपभ्रंश भारती 21
. अर्थ - जैसे नमक पानी में विलीन हो जाता है, इसी प्रकार यदि चित्त आत्मा में विलीन हो जाये तो जीव समरस हो गया। समरसता ही समाधि है। समाधि में और क्या किया जाता है?
मुनिश्री ने आत्मा-परमात्मा की अद्वैत रहस्यानुभूति निम्न गाथा में व्यक्त की, जो अद्भुत है -
मणु मिलियउ परमेसरहं परमेसरु वि मणस्स।
विण्णि वि समरसि हुइ रहिय पुज्ज चढाउं कस्स।।50॥
अर्थ - मन परमात्मा से मिल गया और परमात्मा भी निजानुभूति परिणति के साथ मिल गया, एकमेव हो गया। दोनों ही समरस-एकरस हो गये। इसलिये मैं पूजा किसकी करूँ!
समरसी भाव व्यक्त करते हुए मुनि रामसिंह ने अपनी आत्मा को प्रेयसी और परमात्मा को प्रिय के रूप में दर्शाया जो रहस्यवादी भावना प्रकट करता है -
हउं सगुणी पिउ णिग्गुणउ णिल्लक्खणु णीसंगु।
एक्कहिं अंगि वसंतयहं मिलिउ ण अंगहिं अंगु॥101।।
अर्थ - मैं (प्रेयसी) रागादि गुण सहित सगुण हूँ और प्रिय (परमात्मा) निर्गुण (निरंजन) निराकार निःसंग है। फिर एक ही अंग (प्रदेश) में दोनों साथ रहने पर भी परस्पर मिलन नहीं होता, यह महान आश्चर्य है।
रहस्यपरक भावना देखिये - किसकी समाधि करूँ? किसे पूजूं? किसे स्पृश्यअस्पृश्य कहकर छोडूं? और किसका सम्मान करूँ? क्योंकि जहाँ देखती हूँ वहाँ अपनी ही शुद्धात्मा (परमात्मा) दिखाई देता है (गाथा 140)। आगे-पीछे, दशों दिशाओं में, जहाँ देखता हूँ वहीं वह भगवान आत्मा है। मेरी भ्रांति मिट गयी। किसी से क्या पूछना (गाथा 176) !
आगे कहते हैं - जिसने दो को मिटाकर एक कर दिया और मन की बेल को आगे नहीं बढ़ने दिया, उस गुरु की मैं शिष्या हूँ, अन्य की लालसा नहीं करती (गा. 175)। रहस्य और अध्यात्म के संकेत गाथा 100 में हैं। इसमें कहा गया