________________
अपभ्रंश भारती 21
माध्यम से जैन अध्यात्म और रहस्यवाद को प्रतिपादित किया। इस आलेख की
·
विषयवस्तु पाहुडदोहा है ।
मुनि रामसिंह
-
एक परिचय
पाहुडदोहा की गाथा 212 में कवि ने अपना नाम 'मुनि रामसिंह' के रूप में घोषित किया है। गाथा इसप्रकार है -
23
अणुपेहा बारह वि जिय भाविवि एक्कमणेण । रामसीहु मुणि इम भणइ सिवपुरि पावहि जेण ।।
अर्थ हे जीव ! एकाग्र मन से बारह भावनाओं की भावना कर। इससे मुक्ति की प्राप्ति होती है - ऐसा रामसिंह मुनि कहते हैं।
उक्त कथन से स्पष्ट है कि पाहुडदोहा मुनि रामसिंह की रचना है। डॉ. हीरालाल जैन ने नाम के साथ 'सिंह' शब्द संलग्न होने से यह अनुमान किया है कि मुनि रामसिंह अर्हदबली आचार्य द्वारा स्थापित 'सिंह' संघ के थे। यह भी सम्भव है कि कवि ने अपने परम्परागत नाम का उल्लेख किया हो। इस प्रकार के नाम पंजाब में विशेषतः चलते हैं। संभव है कि कवि पंजाब से राजस्थान आ गये हों। डॉ. हीरालाल जैन के शब्दों में " ग्रन्थ में करहा (ऊँट) की उपमा बहुत आयी है तथा भाषा में भी राजस्थानी हिन्दी के प्राचीन मुहावरे दिखाई देते हैं। इससे अनुमान होता है कि ग्रन्थकार राजपूताना प्रान्त के थे । " 2
कवि का समय
मुनि रामसिंह ने आचार्य कुन्दकुन्द के समयपाहुड, पवयणपाहुड, लिंगपाहुड आदि आध्यात्मिक ग्रन्थों का सार तथा परमात्मप्रकाश एवं योगसार की भाषा-शैली के प्रकाश में पाहुडदोहा की रचना की। आचार्य अमृतचन्द्र दशवीं शताब्दी में हुए। उन्होंने समयसार, प्रवचनसार और पंचास्तिकाय ग्रन्थों की विशद टीका लिखी और कुन्दकुन्द का रहस्य उद्घाटित किया ।
• डॉ. देवेन्द्रकुमार शास्त्री द्वारा सम्पादित पाहुडदोहा का प्रकाशन भारतीय ज्ञानपीठ से 1998 में हुआ।