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अपभ्रंश भारती 21
प्राकृत भाषा के साहित्यिक रूप लेने पर लोकभाषा के रूप में अपभ्रंश भाषा का उदय और विकास हुआ। जैन आचार्यों ने लोकभाषा के रूप में अपभ्रंश भाषा को अपनाया और अपभ्रंश में भी साहित्य का सृजन किया। यह क्रम 7वीं शताब्दी से 17वीं शताब्दी तक लगभग एक हजार वर्ष तक प्रवहमान रहा। डॉ. ज्योतिप्रसाद जैन के अनुसार 12वीं शताब्दी उसका मध्याह्न काल था, उस समय तक यह एक समृद्ध और प्रौढ़ साहित्यिक भाषा हो चुकी थी - यहाँ तक कि इसके स्वतंत्र व्याकरण, छन्दशास्त्र और कोष की आवश्यकता प्रतीत होने लगी थी। इस भाषा को विभ्रष्ट संस्कृत, अपभ्रष्ट प्राकृत, अपभ्रंश आदि नामों से पुकारा गया। अपभ्रंश के साहित्यिक रूप लेने पर लोकभाषा के रूप में हिन्दी, गुजराती, मराठी आदि भाषाओं का उदय हुआ।
जैन आचार्य और विद्वानों ने अपभ्रंश भाषा में जैन साहित्य का सृजन विपुल रूप से किया। इस भाषा के समग्र साहित्य का पिचहत्तर प्रतिशत (75%) भाग जैन साहित्य का है। महाकवि स्वयंभू ने अपभ्रंश भाषा में पउमचरिउ, रिट्ठणेमिचरिउ (अरिष्टनेमिचरित्र) आदि महाकाव्यों की रचना की। उनके पुत्र त्रिभुवन स्वयंभू ने सात सन्धियाँ पउमचरिउ में और जोड़ दीं। महाकवि पुष्पदन्त ने महापुराण नामक महाकाव्य सृजित कर अपना नाम अमर कर दिया। जैनकवि देवसेन, महेश्वरसूरि, पद्मकीर्ति, धनपाल धक्कड़, हरिषेण, नयनन्दि, धवल, वीर, श्रीचन्द आदि ने अपनी काव्यकृतियों से अपभ्रंश साहित्य को समृद्ध किया। इनके उपरान्त श्रीधर कनकामर, धाहिल, यशःकीर्ति आदि कवियों ने सरस कृतियाँ प्रदान की।
आचार्य हेमचन्द्र ने अपभ्रंश भाषा का स्वतंत्र व्याकरण लिखा। नरसेन, सिंह, माणिक्यराज, पद्मकीर्ति और रइधू मध्यकाल के अपभ्रंश साहित्यसृजक हुए। इनमें रइधू ने लगभग 25 रचनाएँ लिखीं। अपभ्रंश में रासकाव्य रचने की विशिष्ट परम्परा रही। कविवर विनयचन्द्र, भगवतीदास, योगदेव, जिनहर्ष सूरविनय, जयविमल, ऋषभदास आदि ने अपभ्रंश रासकाव्य रचकर अपभ्रंश को अमर कर दिया। कहा (कथा) साहित्य का भी सृजन हुआ। आचार्य योगीन्दुदेव ने परमात्मप्रकाश, योगसार, आदि अध्यात्मपरक रचनाएँ अपभ्रंश में लिखीं। मुनि रामसिंह ने ‘पाहुडदोहा' के