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अपभ्रंश भारती 21
को पूजा-उपासना की आवश्यकता नहीं रहती। वह तो परमतत्त्व को प्राप्त कर लेता है। फिर पूज्य, पूजक या उपास्य और उपासक का सम्बन्ध समाप्तप्रायः हो जाता है। दोनों अभिन्न हो जाते हैं तो कौन किसकी पूजा करे? यही तो रहस्यवाद की अंतिम अवस्था है।
मन की चंचल वृत्ति मिट जाने पर योगियों को सर्वत्र आत्मा दिखने लगती है। मन सब व्यापारों से मुक्त हो जाता है। मन के व्यापार टूट-छूट जाने पर रागद्वेष भाव भग्न हो जाते हैं। आत्मा परमात्मा-परमपद में मिल जाता है, इसको मुनिश्री ने निर्वाण कहा है। यही शून्य स्वभाव है, पाप-पुण्य सबसे आत्मा मुक्त हो जाता है। विषयों का त्याग, कर्मों का क्षय एवं विषयोन्मुख मन को निरंजन आत्मा में लगाना ही मोक्ष का कारण है। इन्द्रिय-सुख निरत व्यक्ति को शाश्वत मोक्ष की प्राप्ति दुर्लभ है। देह में बसनेवाले देव को जान लेने पर सब विषय छूट जाते हैं
और सब कर्म नष्ट हो जाते हैं। शुभ-अशुभ सभी संकल्प नष्ट हो जाते हैं और जन्म-मरण से मुक्ति मिल जाती है। विषयों की अनेक स्थलों पर तीव्र निंदा की गई है। शास्त्र, तीर्थ, मूर्तिपूजा की भी निंदा मुनिश्री ने की है। मुक्ति को स्त्री, मन को प्रियतम, देह को महिला, आत्मा को प्रिय जैसी कल्पनाओं में साधना के प्रेममय मधुर रूप की झलक देखी जा सकती है। ‘पाहुडदोहा' के छन्दों में अनेक बार एक ही विषय की पुनरावृत्ति हुई है।
सुनिश्री रामसिंह की मान्यता है कि तीर्थ यात्रा, मूर्तिपूजा, मंदिर-निर्माणादि की अपेक्षा देह-स्थित देव का दर्शन करना चाहिए। आत्मा इसी देह में स्थित है किन्तु देह से भिन्न है और उसी का ज्ञान परमावश्यक है -
हत्थ अहुट्ठहं देवली वालहं णा हि पवेसु। संतु णिरंजणु तहि वसइ णिम्मलु होइ गवेसु॥94।।
अर्थात् यह साढ़े तीन हाथ का छोटा-सा शरीररूपी मंदिर है। मूर्ख लोग इसमें प्रवेश नहीं कर सकते। इसी में निरंजन वास करता है। निर्मल होकर उसे खोजिए।