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अपभ्रंश भारती 21
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तप के आचरण से, तपस्या से संसार, जन्म किये हुए कर्म नाश करता है
अवसर्पिणीउत्सर्पिणी के
छह भेद
तवचरणे भव किर कम्मु
पणास सुखमा सुखमा
अवसप्पिणिउवसप्पिणिहिं छह भेयहिं जहिं संट्ठियउ कहि कालु-चक्कु परमेसर कहियउ वहइअ
णिट्ठियउ 2.1 परमेसरेण
रवि-कित्ति
जहाँ संस्थित हैं कहाँ काल-चक्र, समय का चक्र परमेश्वर कहा गया, कहा हुआ पर्याप्त समग्र अभिव्यक्त परमेश्वर के द्वारा विस्तार से कहा गया (रव-कहना, कित्ति-विस्तार) वृतान्त, विषय-प्रकरण
वुत्तु पढमाणिउ पढम+आणिउ
प्रमुख एवं लाया हुआ पादपूरक अव्यय सुन यह चित्त से, मन से दस क्षेत्रों में
सुणि एय चित्तु दह
खेत्तहिं | भरहेरावएहिं | भरह+एरावएहिं
2.2
भरत
और ऐरावत के