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92
1.8
1.9
1.10
1.11
होउ
सावयकुले
रइ
य
मू
संवोहण
मारा
भवे - भवि
रिसि
गुरु
हों
भडारा
दीणि
करुण
उपेक्ख
यंत
भवि भवि
रइ
वुढउ
गुणवंत वय - जोगाउ
सरीरु
उप्पज्जउ
-
भवि भवे तव-सिहि-तावें
छिज्जउ
धणु
परियणु
पुरु
घरु
मा
दुक्कउ
होवे श्रावक कुल में आसक्ति
पादपूरक अव्यय
आसक्ति (मोह) में डूबा हुआ, मुग्ध
संबोधन, ज्ञान
मृत्यु
भव भव में
ऋषि-मुनि
गुरु
होवें
पूज्य
दीन
दया के पात्र
उपेक्षित जन
दयावान के द्वारा
भव भव में
प्रेम
बढ़े
गुणवान के द्वारा
व्रत- योग्य, व्रत करने में समर्थ
शरीर, देह
उत्पन्न होवे
भव भव में
तपस्या की अग्नि के ताप द्वारा
विच्छेद किया जाय
धन (में) परिवार
प्रचुर, अधिक
घर
नहीं
प्रवृत्ति करना,
प्रवेश करना
अपभ्रंश भारती 21