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________________ 62 अपभ्रंश भारती - 11-12 णं धरणिएँ धरियउ दिव्ववेसु पुणु पभणमि जसहरणिवचरित्तु वइयरविचित्तु जं जेम वित्तु। बहुदीवमहण्णवमंडलिल्लि इह तिरियलोइ मयसंकडिल्लि। वित्थिण्णएँ जंबूदीवि भरहें खरकिरणकरावलिभूरिभरहें। जोहेयउ णामि अत्थि देसु णं धरणिएँ धरियउ दिव्ववेसु। जहिँ चलइँ जलाइँ सविब्भमाइँ णं कामिणिकुलइँ सविब्भमाईं। भंगालइँ णं कुकइत्तणाइँ जहिँ णीलणेत्तणिद्धइँ तणाइँ। कुसुमियफलियइँ जहिँ उववणाइँ णं महिकामिणिणवजोव्वणाइँ। गोवालमुहालुंखियफलाइँ जहिँ महुरइँणं सुकयहाँ फलाइँ। मंथररोमंथणचलियगंड जहिँ सुहि णिसण्ण गोमहिसिसंड। जहिँ उच्छुवणइँ रसदंसिराइँ णं पवणवसेण पणच्चिराइँ। . जहिँ कणभरपणविय पिक्क सालि जहिं दीसइ सयदलु सदलु सालि। जहिँ कणिसु कीररिछोलि चुणइ गहवइसुयाहि पडिवयणु भणइ। छोक्करणरावरंजियमणेण पहि पउ ण दिण्णु पंथियजणेण। जहिँ दिण्णु कण्णु वणि मयउलेण गोवालगेयरंजियमणेण। जहिँ जणधणकणपरिपुण्ण गाम पुर णयर सुसीमाराम साम। घत्ता - रायउरु मणोहरू रयणंचियघरु तहिँ पुरवरु पवणुद्धयहिं। चलचिंधहिँ मिलियहिँ णहयलि घुलियहिँ छिवइ व सग्गु सयं मुअहिँ। जसहरचरिउ 1.3 अब मैं विचित्र वृत्तान्त से युक्त जो जैसा घटा वैसा यशोधर नरेश के चरित्र का वर्णन करता हूँ। अनेक द्वीपों और महासमुद्रों से मण्डित तथा प्राणियों से भरपूर इस तिर्यग्लोक में विस्तीर्ण जम्बूद्वीप है, उसमें सूर्य की उष्ण किरण-पुंज से पूरित भरत क्षेत्र है और उसमें यौधेय नाम का देश है मानो धरा ने दिव्य वेष धारण किया हो। वहाँ नदियों में भौंरें पड़ता हुआ जल ऐसा प्रवाहित होता था जैसे कामिनियों के समूह हाव-भाव-विभ्रम दिखाते हुए चल रहे हों। वहाँ नीले बन्धनों से युक्त घास के पूले भंगों-सहित ऐसे थे जैसे नील नेत्रों से प्रेम की सूचना देनेवाली कामुक स्त्रियों के वर्णन से युक्त कुकवियों की कविताएँ हों । वहाँ के उपवन पुष्पों और फलों से परिपूर्ण थे मानो महीरूपी कामिनी का नया यौवन ही हो। ग्वालों के मुखों से चूसे गये फल ऐसे मधुर थे जैसे सत्कर्मों के फल। वहाँ गायों और भैंसों के झुण्ड सुख से बैठे धीरे-धीरे रोमन्थण में गाल चलाते हुए दिखाई देते थे। वहाँ गन्ने के खेत अपना रस दिखलाते हुए मानो पवन के वेग से नाच रहे थे। वहाँ की पकी धान कणों के भार से झुक रही थी, तथा शतदल कमल भौंरों से युक्त दिखाई देते थे। वहाँ शुकों के झुण्ड धान के कण चुनते एवं खेतों को रखानेवाली गृहस्थों की कन्याओं को प्रत्युत्तर दे रहे थे। छुछकारने की ध्वनि से मनोरंजन करनेवाले पथिकजन मार्ग में पैर आगे बढ़ा ही नहीं पाते थे। वहाँ ग्वालों के गीतों से मनोमुग्ध होकर वन में मृगसमूह कान देकर सुनने में मग्न हो जाते थे। वहाँ के ग्राम, पुर और नगर, जन, धन और धान्य से परिपूर्ण थे, एवं उद्यान अपनी-अपनी सीमाओं में हरे-भरे थे। ऐसे उस यौधेय देश में राजपुर नामक मनोहर नगर था जहाँ के घर रत्नों के संचय से पूर्ण थे तथा जो अपने पवन के वेग से चलायमान तथा आकाशतल में मिलते-घुलते ध्वजों से मानों अपनी भुजाओं द्वारा स्वर्ग को छूता हुआ दिखाई देता था। अनु. - डॉ.हीरालाल जैन
SR No.521858
Book TitleApbhramsa Bharti 1999 11 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani, Gyanchandra Khinduka, Gopichand Patni
PublisherApbhramsa Sahitya Academy
Publication Year1999
Total Pages114
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Apbhramsa Bharti, & India
File Size9 MB
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