SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 74
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अपभ्रंश भारती कलात्मक, मधुर और आकर्षक बन गया है, वहाँ आध्यात्मिक उपलब्धि का भी आधार बन गया है । उसमें जहाँ उज्ज्वलता और उदात्तता है वहाँ नव्यता, दिव्यता और पावनता भी है, पर कहीं माँसलता और ऐहिकता नहीं है । -11-12 61 1. करकंडचरिउ - संपा. डॉ. हीरालाल जैन, प्रकाशक भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन । 2. जसहरचरिउ - संपा. डॉ. परशुराम लक्ष्मण वैद्य, 1.3.14, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन । 3. दुहन्त्योऽभिययुः कश्चिद् दोहं हित्वा समुत्सुकाः । पयोऽधिश्रित्यसंयावमनुद्वास्यापरा ययुः ॥ परिवेषयन्त्यस्तद्धित्वा पापयन्त्यः शिशून् पयः । शुश्रूषन्त्यः पतीन् काश्चिद् श्रन्त्योऽपास्य भोजनम् ॥ लिम्पन्त्यः प्रमृजन्त्योऽन्या अंजंत्यः काश्चः लोचने । व्यत्यस्तवस्त्राभरणाः काश्चित् कृष्णांतिकं ययुः ॥ • श्रीमद्भागवत, 10वाँ स्कंध, अध्याय 29, 5.6.7 4. कवि माणिणि चल्लिय ललियदेह, मुणिचरणसरोयहँ बद्धणेह | कवि णेउरसछें रणझणंति, संचल्लिय मुणिगुण णं थुणंति । कवि रमणु ण जंतउ परिगणेइ, मुणिदंसणु हियवएँ सइँ मुणेइ । कवि परिमलु बहलु वहंति जाइ, विज्जाहरि णं महियलि विहाइ । (9.2.3) 49 बी, आलोक नगर आगरा - 282010
SR No.521858
Book TitleApbhramsa Bharti 1999 11 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani, Gyanchandra Khinduka, Gopichand Patni
PublisherApbhramsa Sahitya Academy
Publication Year1999
Total Pages114
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Apbhramsa Bharti, & India
File Size9 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy