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________________ अपभ्रंश भारती - 9-10 111 इन समस्त धर्मों को जानना चाहिये, इसी से सुख की प्राप्ति होती है तथा इच्छित फल मिलता है, गृह तथा परिजन अनुकूल होते हैं। इसके बिना सब विमुख हो जाते हैं।" युद्धकाण्ड इकहत्तरवीं संधि में रावण जैन मुनि शांतिनाथ का अभिवंदन करता है; इस वंदना से यह अभिव्यक्त होता है कि रावण मुनि के सगुण रूपयुक्त होने के साथ ही उनके निर्गुण रूप की चर्चा करता है। बहत्तरवीं संधि में भी रावण द्वारा शांति जिनालय में भगवान शांतिनाथ की अभ्यर्थना को दर्शाया गया है। इसके अतिरिक्त सत्तरवीं संधि में भी राम-लक्ष्मण हेतु बलदेव तथा वासुदेव शब्द का प्रयोग मिलता हैं णिहएँ वासुएव-बलएवें । - 4.7.10 उत्तरकाण्ड . अठहत्तरवीं संधि में राम ने सीता-लक्ष्मण तथा अनुचरों सहित शांतिनाथ भगवान की स्तुति की है। - अस्सीवीं संधि में जैनधर्म के मंत्रों का उल्लेख दिया गया है - जो भव्यजनों के लिए धर्म की शुभधारा है उसने ऐसे पांच णमोकार मंत्र का उच्चारण किया, अरहंत भगवान के सात उन वर्णों का उच्चारण किया जो सब सुखों के आदि निर्माता हैं, फिर उसने सिद्ध भगवान के पाँच वर्णों का उच्चारण किया जो शाश्वत सिद्धि को देते हैं, फिर उसने आचार्य के सात वर्णों का उच्चारण किया जो परम आचरण के विचारक हैं, फिर उसने उपाध्याय के नौ वर्णों का उच्चारण किया और सर्वसाधुओं के नौ वर्णों का उच्चारण किया जो संसार के भय को दूर करते हैं। इस प्रकार पैंतीस अक्षर, जो शास्त्ररूपी समुद्र की परम्पराएँ बनाते हैं, जो विष के समान विषम विषयों का नाश करते हैं तथा जो मोक्षनगरी के द्वारों का उद्घाटन करते हैं वे शुभगति प्रदान करें। इक्यासीवीं संधि में सीता की इच्छानुसार राम जिन भगवान की पूजा करते हैं। पचासीवीं संधि में राम के लिए वासुदेव शब्द प्रयुक्त हुआ है।” सत्तासीवीं संधि में आदरणीय ऋषभनाथ की चरणभक्ति निर्गुण ढंग से की गई है- जो सचराचर धरती को छोड़कर तीनों लोकों के ऊपर विराजमान हैं। जिनका नाम शिव, शम्भु और जिनेश्वर हैं, देवदेव महेश्वर हैं, जो जिन, जिनेंद्र, कालंजय, शंकर, स्थाणु, हिरण्यगर्भ, तीर्थंकर, विधु, स्वयंभू, सद्धर्म,स्वयंप्रभु, भरत, अरुह, अरहंत, जयप्रभ, सूरि, ज्ञानलोचन, त्रिभुवनगुरु, केवली, रुद्र, विष्णु, हर, जगद्गुरु, सूक्ष्मसुख, निरपेक्ष परम्पर, परमाणु परम्पर, अगुरु, अलघु, निरंजन, निष्कल, जगमंगल, निरवयव और निर्मल है। इन नामों से जो भुवनतल में देवताओं, नागों तथा मनुष्यों के द्वारा संस्तुत्य हैं, तुम उन परम आदरणीय ऋषभनाथ के चरणयुगलों की भक्ति में अपने को डुबा दो। - अट्ठासीवीं संधि में लक्ष्मण के लिए आठवें वासुदेव शब्द का प्रयोग किया गया है।"
SR No.521857
Book TitleApbhramsa Bharti 1997 09 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani, Gyanchandra Khinduka, Gopichand Patni
PublisherApbhramsa Sahitya Academy
Publication Year1997
Total Pages142
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Apbhramsa Bharti, & India
File Size10 MB
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