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________________ अपभ्रंश भारती 7 मैं उस करकंड नरेन्द्र के चरित्र का वर्णन करता हूँ, जो लोगों के कानों को सुहावना, मधुर और ललित लगनेवाला है, पंच कल्याणक विधिरूपी रत्न से जटित है और जो गुणों के समूह से भरा हुआ एवं प्रसिद्ध है। 52 साथ ही अपनी अल्पज्ञता प्रकट करते हुए, पूर्ववर्ती कवि एवं आचार्यों को नमन किया है। अंतिम दसवीं संधि के 28वें कड़वक में अपना परिचय देते हुए आत्म-निवेदन किया है - मइँ सत्थविहीणइँ भणिउ किं पि । सोहेविणु पयडउ विबुहु तं पि ॥ परकज्जकरणउज्जुयमणाहँ । अप्पाणउ पयडिउ सज्जणाहँ ॥ कर जोडिवि मग्गिउ इउ करंतु । महो दीणहो ते सयलु वि खमंतु ॥ मुझ शास्त्र - विहीन ने जो कुछ कहा है, उसे विद्वान् शोधकर प्रकट करें। मैंने तो परोपकार में उद्यत-मन सज्जनों को आत्म-भाव प्रकट किया है और हाथ जोड़कर यह माँगा है कि वे मुझ दीन के समस्त दोषों को क्षमा करें। - धनपाल भी 'भविसयत्तकहा' में अपने काव्य की पतवार विद्वानों को यह कहकर सौंपते हैं कि मैं मन्दबुद्धिवाला, गुणों से हीन तथा व्यर्थ का व्यक्ति हूँ । हे बुधजन ! तुम मेरी काव्यकथा को संभाल लेना - बुहयण संभालमि तुम्ह तेत्थु, हउं मन्दबुद्धि णिग्गुण विरत्थु । सज्जन-प्रशंसा तथा दुर्जन-निन्दा ऐसी ही उक्तियों का ध्वन्यर्थ है । पुष्पदंत तो दुर्जनों की टेढ़ी भृकुटियाँ देखने से गिरि-कंदराओं में घास खाकर रहजाने को अच्छा कहते हैं ।" परवर्ती हिन्दी की आदिकालीन रास तथा रासक-कृतियों के साथ, मध्यकालीन प्रबन्धों में इन्हें यथावत् देखा जा सकता है। 'पृथ्वीराज रासो' का कवि तो अपने कृतित्व को पूर्व-कवियों का उच्छिष्ट - 'तिनैंकी उचिष्टी कवीचंद भख्खी' कहकर विनम्रता प्रकट करता है। जायसी स्वयं को पूर्व-कवियों का 'पिछलग्गू' - ' 'हौं कवित केर पिछलग्गू' कहता है और तुलसीदासजी 'कवित-विवेक एक नहिं मोरे' कहकर अपनी अल्पज्ञता का ही निवेदन करते हैं। पुनः 'जो कोई इस चरित्र को पढ़ेगा, सुनेगा, मन में चिंतन करेगा अथवा जनपद में प्रकट करेगा, वह नर संसार में प्रतिष्ठित होकर, गुणों से युक्त सुंदर कीर्ति को प्राप्त करेगा 12 कहकर जिस प्रकार करकंडचरिउ के धार्मिक प्रयोजन को इंगित किया गया है, वैसा अपभ्रंश की परवर्ती कृतियों तथा हिन्दी की अनेक रचनाओं में अवलोकनीय है । 3 - इसीप्रकार कथा - संघटन में रोचकता एवं सरसता का समावेश करने के लिए विविध कथानक-रूढ़ियों का प्रयोग मुनि कनकामर ने यहाँ किया है। लोक- कहानियों की यह अपनी विशेषता रही है । यहाँ प्रयुक्त कथा - रूढ़ियों को निम्न रूप में देखा जा सकता है -- 1. अपशकुन के कारण पुत्री को नदी में बहाना, 2. युवती के रूप पर मोहित होना अथवा रूप-गुण-श्रवण से प्रेमोदय और विवाह, 3. दोहदकामना, 4. हाथी द्वार राजा-रानी को लेकर जंगल में भागना, 5. रानी के सूखे वन में प्रवेश से उसका हरा-भरा होना, 6. स्त्री की स्त्री के
SR No.521855
Book TitleApbhramsa Bharti 1995 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani, Gyanchandra Khinduka, Gopichand Patni
PublisherApbhramsa Sahitya Academy
Publication Year1995
Total Pages110
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Apbhramsa Bharti, & India
File Size8 MB
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