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________________ अपभ्रंश-भारती- 3-4 अव्यय-प्रयोग इसमें बहुविध अव्यय - प्रयोग प्राप्त होते हैं । यथा - 'वप्पुडडं' अर्थात् बेचारा (पद्य-5), 'अडवड' अर्थात् अटपटा (पद्य - 6), 'अण्णु कि' अर्थात् तो और क्या (पद्य-70) जैसे अव्यय प्रयोगों के अतिरिक्त 'अम्मिए' ( पद्य - 51) आश्चर्यसूचक अव्यय तथा 'जि', 'इ' ये दो निश्चयार्थक अव्यय भी प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार पद्य - 108 में 'पुत्तिए' अर्थात् पुत्रि के ' अम्मिए' के सदृश सम्बोधनार्थ अव्यय-सा प्रतीत होता है। देशी प्रयोग अपभ्रंश भाषा तो अपने विशिष्ट देशी प्रयोगों के द्वारा ही जानी जाती है। 'दोहा - पाहुड' में 'शिथिल' के अर्थ में 'ढिल्लउ' ( पद्य - 43), 'काँटा' के लिए 'सल्लडा' (पद्य-74), स्पृश्यअस्पृश्य' के लिए 'छोपु - अछोपु', (पद्य-139), लज्जावान शब्द के लिए 'धंधवालु' (पद्य122) जैसे विशिष्ट - देशी प्रयोग प्राप्त होते हैं। वहीं पद्य क्रमांक 113 में 'भियमडा' जैसे विशिष्ट देशी शब्द का प्रयोग भी प्राप्त है, जिसका अर्थ अद्यावधि अज्ञात ही है । 69 अन्य प्रयोग पूर्वोक्त विविध प्रयोगों के अतिरिक्त कतिपय लोकोक्तियों के विशिष्ट प्रयोग इसमें हैं, जैसे - पद्य-21 में डाल से चूके बन्दरों के समान' के लिए 'पलंबचुय - बहुय', इसी प्रकार पद्य - 97 में 'उस एक अक्षर को पढ़ो, जिससे शिवपुर गमन हो' प्रयुक्त इस वाक्य की तुलना कबीर के 'ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े, सो पण्डित होए' से की जा सकती है तथा पद्य - 155 की शब्दावली एवं भाव की 'मृच्छकटिकम्' नाटक में एक नाई के बौद्ध भिक्षु बन जाने पर उसके द्वारा दिए गए उपदेश में आश्चर्यजनक समानता है।" इसी प्रकार लोकोक्तियों एवं तुलनात्मक प्रयोगों के अतिरिक्त, कतिपय विशिष्ट प्रयोग भी इसमें प्राप्त होते हैं। यथा - 'एकल्लड' अर्थात् अकेला (पद्य - 75), संधुक्की अर्थात् स्फुलिंग (पद्य - 87 ) जैसे प्रयोग भी उपलब्ध हैं। पद्य - 184 में 'सयलीकरणु' अर्थात् 'सकलीकरण' एक विधान है, जो देवाराधना, देवप्रतिष्ठादि में विघ्नशान्ति के हेतु किया जाता है। इसी प्रकार 'खवणअ' से 'क्षपणक' अर्थात् 'दिगम्बर', 'सेवड' से 'श्वेताम्बर' का अभिप्राय है। साथ ही हिन्दी कविता जैसे तुकान्त प्रयोग वैसे तो पूरे ही ग्रन्थ में उपलब्ध हैं किन्तु पद्य क्रमांक 139-140 आदि में विशेषरूप से दृष्टव्य हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि 'दोहा - पाहुड' ग्रन्थ में अपभ्रंश भाषा के अनेकविध विशिष्ट प्रयोग प्राप्त होते हैं जो कि भाषा - शास्त्रीय अध्ययन की दृष्टि से बहु-उपयोगी उपादान बन सकते हैं। 1. डॉ. जैन देवेन्द्रकुमार, अपभ्रंश भाषा और साहित्य, ग्रन्थांक - 152, प्रथम संस्करण 1966, पृष्ठ सं. 42 । - 2. वही, पृष्ठ संख्या 26 1 3. डा. सिंह वासुदेव, अपभ्रंश और हिन्दी में जैन- रहस्यवाद, प्रथम संस्करण, संवत् - 2022, पृष्ठ सं. 511
SR No.521853
Book TitleApbhramsa Bharti 1993 03 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani, Gyanchandra Khinduka, Chhotelal Sharma
PublisherApbhramsa Sahitya Academy
Publication Year1993
Total Pages90
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Apbhramsa Bharti, & India
File Size7 MB
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