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अपभ्रंश - भारती - 3-4
महाकवि ने रामपुरी के वर्णन में चित्रोपम बिम्ब-विधान के सहारे प्रकृति का मनोरम चित्र प्रस्तुत किया है। ऐसे बिम्बों के निर्माण में कल्पना के सम्मूर्तन से काम लिया गया है। इस चित्र में सम्पूर्ण चित्र - फलक को कल्पना की उदात्त संयोजन-शक्ति की विशाल पार्श्वभूमि प्रदान की गई है, जिसमें महाकवि की विधायक कल्पना और पाठकों की ग्राहक कल्पना की एकमेकता का अतिशय श्लाघ्य संयोजन हुआ है ।
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इस प्रकार, महाकवि स्वयम्भू के नगर-वर्णनों में चाक्षुष बिम्बों की प्रचुरता है। नगरविषयक स्थापत्य के वर्णन में महाकवि द्वारा निर्मित बिम्ब सहज ही विस्मित कर देने की शक्ति से संवलित हैं। बिम्बविधान के सन्दर्भ में महाकवि की ललित काव्यभाषा की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। महाकवि स्वयम्भू की काव्यसाधना मूलतः काव्यभाषा की साधना का ही उदात्त रूप है। महाकवि की अनन्त सागर के विस्तार जैसी काव्यभाषा से उद्भूत बिम्ब लहर की भाँति उल्लासकारक और हृदयाह्लादक हैं। इनमें महाकवि की सूक्ष्म भावनाओं या अमूर्त सहजानुभूतियों को मूर्त्तता या अभिव्यक्ति की मोहक चारुता प्राप्त हुई है, जिनमें महाकवि के घनीभूत संवेगों का संश्लिष्ट रूप समाहित है।
महाकवि स्वयम्भू ने संस्कृत और प्राकृत के अनेक जीर्ण बिम्बों (घिसे-पिटे बिम्बों ट्राइट इमेजेज) का कायाकल्प किया है और उन्हें मार्मिक एवं नूतन अर्थच्छवियों से अभिमण्डित किया है। राजगृह नगर को नवयौवना पृथ्वी का मँगटीका बनाना या फिर दुष्प्रेक्ष्य सूर्य को दर्पण में प्रतिबिम्बित करना और ध्वजा-रूपी हथेलियों पर आकाशपथ को धारण करना आदि महाकवि के द्वारा प्रस्तुत सर्वथा अनास्वादित और प्रत्यग्र बिम्ब हैं, जो अन्यत्र प्रायोदुर्लभ हैं ।
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निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि महाकवि स्वयम्भू की काव्यभाषा में काव्य के शाश्वतिक गुण बिम्ब-सौन्दर्य प्रचुर मात्रा में सुरक्षित हैं, जिनके सांगोपांग अध्ययन-अनुशीलन के लिए मनस्वी और उत्साही अनुसन्धित्सुओं के सारस्वत प्रयत्न सतत प्रतीक्षित हैं ।
पी. एन. सिन्हा कॉलोनी भिखनापहाड़ी
पटना-800006