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अर्थ :--- हे घोरातिघोर-संसार-सागर के पार तीरगामिन् ! आरार्तिक्यदीप से अर्चा करनेवालों के नीराजनाकार'-रागहारिन् ! विश्वजयी कामदेव के कोदण्ड (पुष्पचाप) का भंग करनेवाले ! सारभूत-शिवसाम्राज्य के सुख-भोक्ता ! आपकी जय हो, नित्य मंगल हो।
अर्थ :--- सुन्दर नवीन-पल्लव-समूह से आकीर्ण अशोक-वृक्ष के समीप सुखपूर्वक नमन करनेवाले, देववृन्द द्वारा की गई सुमनवृष्टि से आसेवित, हे निष्कलंक भव्यात्माओं के हृदय-संनिविष्ट तिमिर-समूह का अपनोदन करनेवाले ! सम्पूर्ण कलाओं से शोभायमान शीतरश्मि सदृशचमरों से वीजित ! परमात्मन् ! आपकी जय हो, नित्यशुभ मंगल हो।
अर्थ :--- हे व्यात्तमुख प्रचण्डसिंह द्वारा धारित कमलासन पर विराजमान ! मण्डलाकृति भामण्डल से शोभायमान ! अपने दिव्यध्वनि से वज्रघोष का दर्प खण्डित करनेवाले ! पुण्डरीक त्रितय-शोभित ! चण्डजयिन् ! आपकी जय हो, नित्य शुभमंगल हो।
अर्थ :--- हे उपमारहित ! भयविहीन ! मुक्तिप्राप्त ! मायावर्जित ! क्षुधा-शोक-मोहविधुर ! परमसुखसम्पन्न ! परमदेव ! परमेश्वर ! परमवीर्य ! निष्पाप ! निर्मलस्वरूप ! हे श्री ऋषभ जिनेश्वर ! आपकी जय हो, नित्य शुभमंगल हो।
शब्द प्रकृति और व्याकरण । 'शब्दप्रकृतिरपभ्रंश, इति संग्रहकारः।'
- (वाक्यपदीय 1/148. हरिवृत्ति, पृ० 134) अर्थ :- अपभ्रंश शब्दप्रकृतिवाला है, अर्थात् साधारण जनता की भाषा से ही अपभ्रंश भाषा का निर्माण हुआ है।
__-व्याकरण केवल उन्हीं भाषाओं का होता है जिनका रूप कुछ स्थिर हो चुका है तथा जो शिष्टसंमत है। किन्तु भाषाविज्ञान संसार की समस्त भाषाओं एवं बोलियों से यहाँ तक कि बहुत शीघ्र परिवर्तित होने वाली जंगली या असभ्य-जातियों की बोलियों से भी संबंध रखता है, बल्कि इन बोलियों एवं जनता में प्रचलित-भाषाओं से ही भाषा के जीवन्त-स्वरूप का पता. साहित्यिक-भाषा की अपेक्षा, कहीं अधिक चलता है। उदाहरणार्थहिन्दी प्रदेश में 'थम्भ' और 'खम्भ' (या खंभा) दोनों शब्द चलते हैं। पहले विद्वान समझते थे कि दोनों शब्दों का विकास संस्कृत' के स्तम्भ शब्द से हुआ है, किन्तु खंभ' शब्द का विकास 'स्तम्भ' से होना बड़ा असंगत लगता था। अस्तु, खोज करने से पता चला कि वैदिक भाषा में एक शब्द 'स्कम्भ' (ऋक् 4/2/14/5, सायण स्तम्भ) भी है, और खंभा' शब्द इसी से विकसित हुआ है। इसप्रकार जनता में प्रचलित भाषा के सहारे हम मूल तक पहुँच सकें, भाषाविज्ञान इसलिए जनता की बोलियों को विशेष महत्त्व देता है, जबकि व्याकरण इनकी ओर दृष्टि उठाकर भी नहीं देखता।
प्राकृतविद्या अक्तूबर-दिसम्बर '2001
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