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टुग्गणी पवल-लेह-सिलं च पटुं, णो लद्ध-कव्व-जिणधम्म-सुसत्थ-सुत्तं। पागासिदण सुदभारदि-सम्म-सेवं, कुव्वेज्जदे अणुरदा बहुटुभावी।।5।।
अर्थ :- वे साहू अशोक राष्ट्रभावना से परिपूर्ण, राष्ट्र को अग्रगामी बनाने के लिए प्रयत्नशील रहे, उस राष्ट्रभावना से वे शिलालेखों, अनुपलब्ध काव्यों, जिनधर्म के शास्त्रों एवं सूत्र-ग्रन्थों को प्रकाशित कराकर श्रुतभारती की सम्यक् सेवा करते रहे। सेवं सुदं सुदगणीण बहुं च माणं, पुरस्करं च पवदिदूण सुलक्ख-लक्खं । साहिच्च-सक्किदि-सुदाण महच्च-दिण्णो, सो पागिदप्पियवरो पददेदि माणं ।।6।। ___ अर्थ :- उन्होंने श्रुतसेवा को महत्त्व दिया, उन्होंने साहित्य एवं संस्कृति के पुत्रों तथा श्रुतगुणीजनों को बहुत मान दिया। उस मान के प्रदान करने के लिए लाखों-लाख रुपयों के पुरस्कार घोषित किए। वे प्राकृत की श्रेष्ठता पर मुग्ध होकर उसे अत्यधिक मान देते रहे। जाणंति सव्वजिणसासण-मग्गगामी, तस्सेव जग्गिद-सुतित्थ-सुरक्ख-रक्खं । सम्मेद-सेल-गिरणार-गिरी विसेसा, तित्था जिणाण पवला जिणमुत्ति-मुत्ती।। 7।। __ अर्थ :- सभी लोग जानते हैं, जिनशासन के अनुयायी मानते हैं कि जिनतीर्थ, जिनमूर्तियाँ, बहुत से तीर्थ, सम्मेदशिखर, गिरनार आदि विशेष इनकी जागृत भावना से सुरक्षा कवच पहने हैं। तं भद्द-आगम-सुदं जिणभत्ति-साहू, साहुत्त-भावण-गुणं मुणि-सद्द-भावं। हासं मुहं सरण-अप्प-जिणाणुरागिं, सेवं सरं परम-अंजलि-अप्प-अप्पं ।।8।।
अर्थ :- उन भद्र परिणामी, आगमश्रुत प्रधानी, जिनभक्ति की परमभावना एवं गुणों के गुणज्ञ, मुनियों के श्रद्धालु, हास्यमुख, सरल आत्मन् तथा जिनानुरागी की सेवा का स्मरण ही हमारी अल्प से अल्प भावना परम-अंजलि होगी।
सद्द-सूद-पहूदगो उदयचंद पूदगो। साहु-असोग-सेट्ठिणं, सरेमि णिच्च पागिदो।।
वृद्धावस्था "हन्त लोको वयस्यन्ते, किमन्यैरपि मातरम् ।
मन्यते न तणायापि, मति: श्लाघ्या हि वार्धकान् ।।" भावार्थ:- बुढ़ापा बड़ी बला है, इस बुढ़ापे में और की तो बात ही क्या? मनुष्य अपने को जीवन देने और पालने-पोषण करनेवाली अपनी माता का भी आदर नहीं करते। इसलिए बुढ़ापे से तो मर जाता ही अच्छा है।
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प्राकृतविद्या अक्तूबर-दिसम्बर '2000