SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 165
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अनुसार अच्छी-बुरी तदनुरूप परिस्थिति में घसीट कर उपस्थित कर देता है। इसमें मूल हेतु आत्मा द्वारा स्व-अध्यवसायानुसार गृहीत ये परमाणु या कर्मरज हैं, न कि अन्य कुछ। यहाँ परमाणुओं की संगति एवं समरूपता, तद्रूपता विचारणीय है। 'लाइक एट्रेक्ट्स लाइक' (सदृश सदृश को आकर्षित करता है)। इसी प्रकार जो आदमी सत्य, अहिंसा, क्षमा, करुणा, विनय, विवेक, सरलता, संयमादि गुणों को जीवन में धारण करता है, फलतः वह तदनुरूप सौम्य अणुओं को अपनी आत्मा में संलग्न करता है, जिसकी संगति स्वर्ग या परमोदार, वैभवशाली मानव-जन्म में होती है; अर्थात् वह उन शुभ अणुओं द्वारा उच्च, उच्चतर देवमनुष्योचित सुखदायी स्थिति में स्वभावतया उपस्थित कर दिया जाता है। यह 'कॉस्मिक लॉ' या 'विश्व-विधान' है। इसमें मनगढन्त या कल्पना की उड़ान जैसी कोई बात या चीज नहीं है; न ही इसमें कोई मनुष्यकृत हथकंडे या ईर्ष्यालु कार्रवाई है। दूसरी दृष्टि से भी देखा जाए तो स्वर्ग-नरकादि का होना न्यायसंगत है। हम देखते हैं कि एक मनुष्य तो हर तरह से सुखी और संपन्न है - सुस्वास्थ्य, तीव्र बुद्धि, सद्विवेक, यथेष्ट अर्थ, पदाधिकार आदि से युक्त हरा-भरा जीवन जी रहा है; किन्तु दूसरा व्यक्ति (उसका ही सगा भाई या पड़ोसी) सर्व अभावों से पीड़ित है और दर-दर की ठोकरें खाता है। जहाँ जाता है वहीं हताशा, वहीं असफलता । यहीं जब मानव-मानव के बीच इतनी बड़ी खाई हमारे सामने है; तब सहज ही अनुमान किया जा सकता है कि इससे भी कहीं अधिक सुख-दुःख की कोई भोगभूमि जरूर होनी चाहिये। अपार विश्व जो अगणित, अकल्प्य लीलाओं की नाट्यशाला है, उसमें स्वर्ग, नरक, निगोदादि का होना, ऐसी स्थिति में, कोई आश्चर्य नहीं? अर्थात् स्वर्ग, नरक, निगोद, एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय, पंचेन्द्रिय, तिर्यंच-पशु, पक्षी, मछली आदि योनियाँ सत्याधारित हैं; जीव की करनी के फल हैं। इसके सिवा अन्य कल्पना-जल्पना मात्र आत्म-प्रवंचन है, अपने-आपको धोखा देना है। ___धर्म तो वस्तु-स्वभाव है-'बत्थु सहावो धम्मो'। 'आत्मा' ज्ञान, ध्यान, शम, दम, आदि असंख्य गुणों की खान है। महापुरुषों द्वारा प्रदर्शित साधना-मार्ग का सचाई और वफादारी से अनुसरण करने से 'आत्मा' में निहित 'सच्चिदानन्द' स्वरूप का पूर्ण विकास होता है और अन्ततः परमानन्दमय 'मोक्ष' की प्राप्ति होती है; दूसरी ओर धर्म-साधना के अभाव में नरक, निगोद एवं ऐकेन्द्रियादि योनियों-जो अपने सामने नृत्य कर रही हैं - की हाज़िरी अनिवार्यतया उनकी बाट जोह रही ऐसे मंगलमय धर्म का कोई व्यक्ति-विशेष यदि असदुपयोग करता है और उसकी ओट में कपट-जाल द्वारा जनता को मार्गभ्रष्ट करता है तो दोष यहाँ उस मायावी का है, न कि मंगलमय धर्म का। जैसे कोई चिकित्सक यदि रोगी तीर्थंकर : जन. फर. ७९/४५ Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520604
Book TitleTirthankar 1978 11 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichand Jain
PublisherHira Bhaiyya Prakashan Indore
Publication Year1978
Total Pages288
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Tirthankar, & India
File Size6 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy