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________________ टिप्पणियाँ (१) ये गड़बड़ियाँ देखा गया है कि अधिकांश सामाजिक और नैतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक गड़बड़ियाँ धर्म के स्वरूप को ग़लत समझने के कारण ही होती है । बात असल में यह है कि हमने धर्म की परिभाषाएं अपने सुभीते से, और सुभीते के लिए घड़ ली हैं, इसीलिए इसे हम कभी ईश्वर-प्रदत्त कहते हैं, कभी केवली -प्रणीत और कभी आचार्य - प्रतिपादित। इसी संदर्भ में हम ऐसे वाक्यों का उपयोग भी करते हैं, जो प्राय: संदर्भ से कटे होते हैं और भ्रान्तियों से जुड़े होते हैं । इन मनमानी व्याख्याओं ने कुछ भ्रम खड़े कर दिये हैं, और एक सिरफुड़ौव्वल वातावरण बना दिया है। वस्तुतः इस बौद्धिक अराजकता से सामान्य जन बड़े संकट में पड़ गया है और अकस्मात् ही धर्म से उदासीन हो गया है । कुछ ऐसे लोग भी हैं जो धर्म की ग़लत व्याख्याओं से जुड़कर या संदर्भ-कटे कथनों में भटककर सम्यक् मार्ग भूल बैठे हैं। कुल मिलाकर स्थिति अत्यन्त विषम और उलझनपूर्ण है । सवाल सहज ही उठाया जा सकता है कि जब वस्तु का व्यक्तित्व या स्वभाव ही उसका धर्म है तो फिर उसके प्राप्त करने की आवश्यकता ही कहाँ है; वह पहले से ही प्राप्त है, उसे उवाड़ना-भर है । क्या स्वभाव ऐसी वस्तु है जिसे कहीं अन्यत्र से लाया जा सकता है ? आत्मधर्म आत्मा को छोड़ नहीं सकता, वह किसी अन्य पदार्थ से संश्लिष्ट दीख सकता है, होता नहीं है; मिथ्याप्रतीति होती है । इसी मिथ्याभास के कारण बुद्धिजीवी वर्ग तरह-तरह की गलतफहमियाँ खड़ी कर लेता है और फिर आपस में 'जूझताझगड़ता है; अतः आवश्यक आज यह है कि हम तथ्यों का स्वयं खूब सावधान, पूर्वग्रहमुक्त, स्वतन्त्र अध्ययन करें, और किसी के बहकावे में न आयें । -श्रीमती विमला जैन ( २ ) महानता की कसौटियाँ हमने महानता की भी कुछ काल्पनिक और अनुमानमूलक कसौटियां घड़ ली हैं । यद्यपि लौकिकों को इन लौकिक कसौटियों पर कसे जाने से अधिक गड़बड़ की आशंका नहीं है; किन्तु जब हम लोकातीत संदर्भों को इन कसौटियों पर डालने लगते हैं तब काफी-कुछ अस्तव्यस्त हो जाते हैं । आज तथाकथित महापुरुषों की संख्या काफी बढ़ गयी है । कोई योगी है, कोई भगवान्, कोई महर्षि, कोई महाराज । एक तरह से इन तथाafrat की एक अनियंत्रित बाढ़ ही आ गयी हैं । अकेले भारत में ही दर्जनों योगी, महर्षि, भगवान् और महाराज सहज ही मिल जाएंगे। किचित् आकर्षक यष्टि- गठन, साधारण-सी असाधारण वृद्धि और कुछ प्रदर्शनात्मक कौशल - एक नयी भगवत्ता को जन्म देने के लिए काफी होते हैं । इस भगवत्ता का असल नाम भगवानगीरी ही कहना होगा; चूंकि इसमें गरिमा और वास्तविकता का स्थान छल-कपट और झांसेबाजी ले लेती है । इस पर तुर्रा यह है कि इन भगवानों को अपना कारोबार चलाने के लिए अलग से कोई लाइसेंस नहीं लेना होता है, सब कुछ अन्धाधुंध चलता जाता है । इस नूतन धार्मिक नेतागीरी के कुछ मानदण्ड इस प्रकार हैं- १. एक तामझामनुमा ढीला चोगा, २. एक चमकीला जादुई लॉकेट, ३. विदेशी युवकों की टोली, ४. निर्धारित वर्दी में कुछ सुदर्शन तरुणियाँ, ५. इधर-उधर से बटोरे हुए कुछ सिद्धान्तहीनों का झुण्ड, ६. विशाल सम्पत्ति - युक्त सुविशाल आश्रम, ७. वातानुकूलित कक्षों में तरह-तरह के तीर्थंकर : नव. दिस. ७८ Jain Education International For Personal & Private Use Only ९९ www.jainelibrary.org
SR No.520604
Book TitleTirthankar 1978 11 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichand Jain
PublisherHira Bhaiyya Prakashan Indore
Publication Year1978
Total Pages288
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Tirthankar, & India
File Size6 MB
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