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________________ जन्म-शताब्दी के पुनीत अवसर पर समपित जीवन के ज्वलन्त उदाहरण एक नहीं अनेकों संस्मरण आज भी याद करते हुए नेत्र सजल हो उठते हैं। ___भारतवर्ष की महान् विभूतियों में भारतीय संस्कृति के महान संत जैन - जैन दिवाकर श्री चौथमलजी महाराज का दिवाकरजी ने एकता और बन्धत्व का जो नाम सदैव स्मरणीय रहेगा। वे तो संपूर्ण अमर सन्देश जन-जन को दिया. जो कभी राष्ट्र के हो गए थे। तभी वे कहते रहे, भुलाया नहीं जा सकता है। जन-जन को 'वसुधा मेरा कुटुम्ब', 'मानवता मेरी आह लादित करनेवाले मक्तिदाता श्रद्धेय साधना' और 'अहिंसा मेरा मिशन'। जैन दिवाकरजी की जन्म-शताब्दी के शुभ इन्हीं सिद्धांतों को हृदयंगम करके उन्होंने पुनीत अवसर पर महान संत को श्रद्धा के अपना जीवन संपूर्ण मानव-समाज के कल्याण सुमन अर्पित करते हैं। के लिए समर्पित कर दिया था। वे शान्ति जैन दिवाकरजी म. सा. की प्रेरणाओं और अहिंसा के अग्रदूत थे। से संघ, समाज और राष्ट्र सदा पल्लवित उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि तो उनके तथा विकसित होता रहे। पारस्परिक आदर्शों को चरितार्थ करने में है। सौहार्द्र और सहिष्णुता के पथ का अमर -एस. हस्तीमल जैन, सिकन्दराबाद संदेश देनेवाले युगवन्दनीय संत को शतशत-वन्दन! आदर्श कर्मयोगी -निर्मलकुमार लोढ़ा, निम्बाहेड़ा जैन दिवाकर गुरुदेव श्री चौथमलजी आदर्श के अखंड स्रोत म. ने संघ की एकता के लिए सब कुछ परम श्रद्धेय जैन दिवाकर चौथमलजी न्यौछावर कर छह संप्रदायों का एकीकरण म. सा. का स्वभाव और प्रवृत्ति इतनी कर पूज्य श्री आनन्द ऋषि म. को प्रधानासरल थी कि वे क्रोधी, लोभी तथा दुर्व्यव- चार्य नियुक्त किया। हारी व्यक्ति को व्याख्यानों द्वारा इतना उन्होंने महाराष्ट्र, गुजरात, मेवाड़, शांत एवं दयालु बना देते कि वह व्यक्ति । गंभीर रूप से आश्चर्यचकित रह जाता था। प्रदेश, जम्म तक भ्रमण किया। रजवाड़ों मारवाड़, मालवा, दिल्ली, पंजाब, उत्तर__ जो सामान्य व्यक्तियों के स्तर से से धार्मिक पर्वो पर हिंसा-निषेध के सरकारी ऊपर उठकर महानता का कार्य करे; छल, फरमान जारी कराये और उनकी नकलें छिद्र, स्वार्थ, क्रोध, लोभ, अहंकार, मोह और भी प्राप्त की। उनका दिल्ली पर भी उपकार सातों दव्यंजनों का त्याग कर देता है, उसे था। उनका सं. १९९५ में चान्दनी चौक में ही हम सन्त कहते हैं। हमारे श्रद्धेय गुरु- चातर्मास हआ था। वे दिल्ली का बराबर देव साधत्व के नियमों का सही रूप से पालन ध्यान रखते थे। कर सारे जग को अपना घर समझ कर एक महान् विभूति बन गए । वे हमारे आराध्य जन्म-शताब्दी पर पूज्य गुरुदेव के और आदर्श के अखंड स्रोत हैं। चरणों में विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। -अशोककुमार नवलखा, निम्बाहेड़ा -कपूरचन्द सुराणा, दिल्ली ८६ तीर्थंकर : नव. दिस. १९७७ Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.520603
Book TitleTirthankar 1977 11 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichand Jain
PublisherHira Bhaiyya Prakashan Indore
Publication Year1977
Total Pages202
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Tirthankar, & India
File Size4 MB
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