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अनुसन्धान-७६
राय परदेशी धन्न, खिमा करी एकमन्न, देवलोक पायउ तिन्न, पूरे हई जगीस रे ॥ भ० ॥२४॥ काहेकुं करत हइ मूढ अहंकार रे, लक्ष्मी तउ नांही थिर, आत जात फिरि फिरि, जुव्वण भी जात खिर, तुं तो हइ गमार रे । जाहीकुं करत गर्व, सोइ विउ जात सर्व, पावइ नांही ओही दर्ता, सोतो वार वार रे । राव हीतइं रांक होइ, रांक हीतइं राव होइ, थिर रहि नांहि कोइ, अथिर संसार रे ॥ भ० ॥२५॥ म म करि गूढ माया कूड ही कपट्ट रे, मायाथई नरक घोर, मायाहीतइं होत ढोर, मायाहीतइ पावइ जोर, दुःखहीतई घट्ट रे । जउ करत परद्रोह, मंडत कपट मोह, आपकुं सो खणि खोह, काहे होत जट्ट रे । हियइ कछु चेत करि, माया-मोह परिहरि, संसार सागर तरि तई तो पायो तट्ट रे ॥ भ० ॥२६॥ सुख होत लोभवसि करत्त करत्त रे, लोभहीतइं राति-दिन्न, चिंतइ मेलु-मेलुं धन्न, दुःख होत लोभ मन्न, धरत्त-धरत्त रे । जोरइ धन्न रुल्ल-रुल्ल, आयु घट्टइ पल्ल-पल्ल, जात यु अंजल जल, झरत्त-झरत्त रे । सुभुम प्रमुख भुप, करते जे दोरधूप, छोडि गए लोभ कूप, भरत्त-भरत्त रे ॥ भ० ॥२७॥ लोभ मुढ कहा करइ देत कुं न दान रे, दान शिवसुखदाय, दानथई दालिद जाइ, घरइं नवनिधि थाइ, मांने राय-रांण रे । दान देवू चित्त लाय, दानें धनवृद्धि थाइ, जइसई वाडी कूप गाय, होत वर्द्धमान रे ।