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________________ ३५ जान्युआरी- २०१९ अश्वसेन-नराधिप-वंश-मणी, चित-चिंतित-पूरण-देव-मणी; मानव-मन-मोहन तुहि जयो, तुझ मुख-शशि देखित हर्ष भयो. २ कलि-युग-मरुमां सुर-तरु सरिखो, फिरतां फिरतां में तुंहि नीरख्यो; हरख्यो मनमें परख्यो जब में, पायो साचो साहिब अब में. ३ सुर असुर नरेसर भमर परें, तुझ चरण-कमल नीत रमण करें; केशर चंदन घनशार घशी, नर नारी पुजे प्रेम हशी. ४ भविअण-कमलाकर-सूर समो, प्रह उठी प्रेमें पास नमो; भव-भावठ-भंजन तुहि मिल्यो, तिणे सयल मनोरथ मुझ फल्यो. ५ धन तुझ जननी वामारांणी, जीणे जनम्यो जीन बहु-गुण-खांणी; चंपक-वरणी जन-मन-हरणी, धन रांणी प्रभावति तुझ घरणी. ६ जस मन तुझ ध्यांने पूर (ध्यांन मयूर?) रहे, तस पातिक-पन्नग न रहे; सहजें मन-वंछित तेह लहें, अहनिश जे नर तुझ ध्यान रहें. ७ गुर्जर-धर-गोरी-भाल-तिलो, संखेश्वर-पास जिणंद भलो; मालव मगसी जन-मन-हरणो, मेवाडें नवपल्लव सूगुणो. ८ फलवधि फल-दायक मरुदेशें, नवखंड नमो सोरठदेशें; पूरव रावणसिंणगार यथा, राअदेश पोसिणो पास तथा. ९ खिला खंतिला रंग वली, तुझ मंदिर नाचे ललीय लली; कांमनी कणयरनी कंब जीसि, ताहरा गुण गाओ हसिय हसी. १० तुझ कीरत धवली जगत फिरें, नीसूणी सूर मानव चित्त ठरे; धरणीधर अहनिश सेव करें, पद्मावति संपद सकल करे. ११ संकट सघलां तुझ नांम टलें, तुझ नांमें लच्छि य आय मिले; तुझ नांमें नासें रोग सवे, दोहिल नांवें तुझ नांम भवे. १२ दीन दीन दोलत चढती करज्यो, सेवक-संकट सघलां हरज्यो; वीनति कहुं कर जोड घणी, तुं स्वामी सबल वीवेक-धणी. १३ जय वामा-नंदन मुनि-पवरो, जय भवियण-वंछित-कल्प-तरो; श्रीकल्याणविजय-गुरु-सीस कहे, जे सेवे ते नवनीधि लहे. १४ ॥ इति श्रीपार्श्वनाथछन्दः सम्पूर्णः ॥ (ला.द. विद्यामन्दिर - १८०३)
SR No.520578
Book TitleAnusandhan 2019 01 SrNo 76
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2019
Total Pages156
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size9 MB
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