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________________ सप्टेम्बर - २०१८ ५१ पाउअरणं दुविहं पायडकरणं पयासकरणं च । स तिमिरे पयडणं समणट्ठा जमसणाईणं ॥४१॥ पाउअ० ॥ प्रादुष्करण प्रकट करिवउं । ते बिहुं प्रकारे हुइ । एक-प्रकट करिवठं, बीजूं-प्रकाशकरण । उजुयालानउकस्वि इम विभेद जाणिवा । जीणइं घरि अंधारई करी कांइं माहि दीसतउं न हुइ ते घरि थिकउ महात्माहुइं विहरावा निमित्त जि कांई अशनपानादिक आहार बाहरि अगासइ काढी मूंकइं ते प्रादुष्करण कहीइ ॥४१॥ हिव ए बिन्हइ भेद व्यगति वखाणइ छइ - पायडकरणं बहिआकरणं देयस्स अहव चुल्लीए । बीअं मणि-दीव-गवक्ख-कुड्ड-छिद्दाइ करणेणं ॥४२॥ पाय० ॥ महात्मा हुई जे देवा जोग्य जे वस्तु घरिमाहि थिकउ काढी देवानइ बाहिरि मूंकइ अजूआलइ अथवा चूल्हा थकउ बाहिरि आगसइ आणइ ते प्रगटकरण इस्यिई नामइं पहिलउ भांगउ जाणिवउ ।१। हिव बीजउ प्रकाशकरण वखाणइ छइ-मणि-रत्नादिके करी, अथवा जालीइं करी, अथवा कुट्ट-भीतिज्ञ छिंद्रनइ करिवइ करी अजूआलूं करी जं गृहस्थ महात्माहुई विहरावइ । ते प्रकाशकरण बीजउ भांगउ जाणिवउ । एहनउ दोष घणउ । तेह भणी टालिवउ । एतलई सातमउ प्रादुष्करणदोष बिहुं प्रकारे कहिउ ॥४२॥ हिव आठमउ क्रीतदोष वखाणइ छइ - किणणं कीयं मुल्लेणं चउहा तं सपर-दव्वभावेहिं । चुन्नाइ, कहाइ, पणाइ, भत्तमंखाइ, रूवेणं ॥४३॥ किणणं० ॥ जे वस्तु महात्मानिमित्त मूलि करी वेचातूं लीजइ, ते क्रीत कहीइ । ते क्रीत चिहुं प्रकारे हुई । एक-स्वद्रव्यक्रीत-१, अनइ स्वभावक्रीत-२, तथा परद्रव्यक्रीत-३, अनइ परभावक्रीत-४ । हिव ए च्यारिइ भांगा वखाणइ छइ- जे महात्मा आपणू चूर्णादिक औषध आपीनइ जे भोजन लहइ, ते स्वद्रव्यक्रीत१। तथा लोकप्रीतिइं कथादिके करी रंजवीनइ जे आहार लिइ, ते स्वभावक्रीत२ । तथा जे गृहस्थ महात्मा निमित्त आपणइ धर्मिनई काई देवानूं लेई नइ दिइ । महात्मा आश्री ते पारकू द्रव्य । तेह भणी ते परद्रव्यक्रीत कहीइ ।३। तथा जे
SR No.520577
Book TitleAnusandhan 2018 11 SrNo 75 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherKalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
Publication Year2018
Total Pages338
LanguageSanskrit, Prakrit
ClassificationMagazine, India_Anusandhan, & India
File Size22 MB
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